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Friday, 18 May 2018

'दिन-रात खटते हैं फिर लोग पूछते हैं काम क्या करती हो

क्या आप ऐसी नौकरी करना पसंद करेंगे जिसमें रोज 16-17 घंटे काम करना हो, हफ़्ते में किसी दिन छुट्टी न मिले, कोई सैलरी न मिले और इन सबके बाद कहा जाए कि तुम काम क्या करते हो? दिन भर सोते तो रहते हो!

असल में देश का एक बड़ा तबका ऐसी ही नौकरी कर रहा है. ये नौकरी करने वाली औरतें हैं. वो औरतें जिन्हें हम हाउसवाइफ़, होममेकर या गृहणी कहते हैं.

गृहणियों के काम को लेकर एक बार फिर चर्चा छिड़ी जब कुछ दिनों पहले कर्नाटक हाइकोर्ट ने एक मामले में अपना फ़ैसला सुनाया.

हुआ ये था कि एक दंपती के बीच तलाक़ का मामला चल रहा था और पत्नी को अदालत में पेश होने के लिए मुज़फ़्फ़रनगर से बेंगलुरु आना था.

वो फ़्लाइट से आना चाहती थी लेकिन पति चाहता था कि वो ट्रेन से आए क्योंकि वो हाउसवाइफ़ है और उसके पास 'बहुत खाली वक़्त' है.

'सातों दिन एक जैसे'

हालांकि जस्टिस राघवेंद्र एस चौहान पति की दलील से सहमत नहीं हुए और उन्होंने कहा कि एक हाउसवाइफ़ भी उतनी ही व्यस्त होती है जितना बाहर जाकर नौकरी करने वाला कोई शख़्स.

ये सारा मामला सुनकर दिल्ली में रहने वाली काजल पूछती हैं, "अगर कोई मर्द ऑफ़िस से आता है तो हम उसके लिए चाय-पानी लेकर तैयार रहते हैं लेकिन हम दिन भर काम करते हैं तो हमारे लिए कोई ऐसे नहीं करता. क्यों?"

तीन साल की बच्ची को गोद में लिए बैठी नेहा कहती हैं, "घर में सबसे पहले सोकर हम औरतें उठती हैं, सबसे देर में बिस्तर पर भी हम ही जाते हैं और फिर सुनने को मिलता है कि हमारे पास काम क्या है!"

चार बच्चों की मां सुनीता जब अपने काम गिनाना शुरू करती हैं तो ये लिस्ट जैसे ख़त्म होने का नाम नहीं लेती.

गुलाबी लिबास पहने श्वेता फीकी हंसी हंसते हुए कहती हैं, "ऑफ़िस में काम करने वालों को तो हफ़्ते में एक-दो दिन छुट्टी भी मिल जाती है. हमारा तो मंडे टू संडे, सातों दिन एक से होते हैं."

क्या कहते हैं पुरुष?

दिल्ली में एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने वाले सागर मानते हैं कि काम तो किसी के पास कम नहीं है. घर के काम की अपनी चुनौतियां हैं और बाहर के काम की अपनी.

वो कहते हैं ''ये कहना ग़लत होगा कि घर पर औरतों के पास काम नहीं होता. हमें तो छुट्टी मिल भी जाती है लेकिन उनको तो हमेशा मुस्तैद रहना पड़ता है. कभी बड़ों की ज़िम्मेदारी...कभी बच्चों की और पति तो है ही. आदमी तो अपनी ज़िम्मेदारी औरत पर डाल देता है लेकिन औरत किसी से नहीं कह पाती. बहुत मुश्किल है हाउसवाइफ़ होना.''

दिल्ली के ही चंदन का मानना है कि घर संभालना बहुत मुश्किल काम है. वो कहते हैं ''ऐसी औरतें काम पर भले न जाती हों लेकिन उनके बिना आप भी काम पर नहीं जा पाएंगे. नाश्ता तो वही देती हैं...फिर साफ-सुथरे, प्रेस किए कपड़े मिल जाते हैं. ये सब हाथों-हाथ नहीं मिले तो दुनिया के आधे मर्द नौकरी पर ही न जा पाएं. जाएं तो रोज़ लेट ही पहुंचे.''

ज़मीनी सच्चाई

अभी कुछ वक़्त पहले मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता में भारत की मानुषी छिल्लर से पूछा गया था कि दुनिया के किस प्रोफ़ेशन को सबसे ज़्यादा सैलरी मिलनी चाहिए थी.

उन्होंने जवाब दिया था- मां को. कहने की ज़रूरत नहीं है भारत में मांओं की एक बड़ी संख्या गृहणी का काम करती है. यानी वो काम जिसे शायद काम की तरह देखा भी नहीं जाता.

मानुषी के इस जवाब की ख़ूब चर्चा हुई थी और इसके बाद उन्होंने प्रतियोगिता जीतकर विश्वसुंदरी का ताज अपने सिर पर पहना.

घर संभालने वाले महिलाओं की बातें सुनकर ऐसा लगता है कि मानुषी का जवाब ज़मीनी हक़ीकत के काफी क़रीब था.

रिसर्च

ऑर्गनाइज़ेशन फ़ॉर इकोनॉमिक को-ऑपरेशन ऐंड डेवलपमेंट की एक रिसर्च में भारत, चीन और दक्षिण अफ़्रीका जैसे 26 देशों का अध्ययन किया गया.

रिसर्च में पाया गया कि इन देशों की महिलाएँ रोज औसतन साढ़े चार घंटे बिना किसी पैसे के काम करती हैं.

55 साल की सुशीला जब नई-नई दुल्हन बनकर ससुराल आई थीं तो घर में इतना काम होता था कि उन्हें खाने-पीने तक का होश नहीं रहता था.

वो कहती हैं, "सुबह उठकर गोबर थापना, गाय-भैंसों को चारा-पानी देना, घर के बच्चों को स्कूल भेजना, मर्दों को टिफ़िन देना, दोपहर में खाना बनाना और फिर शाम का चाय-नाश्ता बनाकर रात के खाने की तैयारी. पूरे दिन रोटी खाने का टाइम ही नहीं मिलता था. रोटी भी भागते-दौड़ते खाते थे."

'हाउसवाइफ़ क्यों कहते हो'

सुशीला आगे कहती हैं, "इतना खटने के बाद घर का ख़र्च चलाने के लिए पैसे मांगो तो पहले सैकड़ों सवाल पूछे जाते हैं और फिर एक-एक पैसे का हिसाब मांगा जाता है. हम भी नौकरी करते तो अपनी मर्जी से पैसे ख़र्च करते."

मंजू को 'हाउसवाइफ़' शब्द से ही दिक्कत है.

उन्होंने कहा, "ऑफ़िस में काम करने वाले या तो दिन में काम करते हैं या रात में. हम लोग तो सुबह से लेकर रात तक काम करते रहते हैं. फिर हमें हाउसवाइफ़ क्यों कहते हो? हम तो घर की महारानी हुए."

कुछ वक़्त पहले चेतन भगत ने भी इस बात की ओर ध्यान दिलाया था. उन्होंने औरतों से कहा था कि वो ख़ुद को हाउसवाइफ़ कहना बंद करें क्योंकि उनकी शादी घर से नहीं बल्कि एक शख़्स से हुई है.

घरवालों की सबसे बुरी बात क्या लगती है?

"हमें सोने नहीं देते. हम बिस्तर पर ठीक से लेट भी नहीं पाते कि कभी चाय की फ़रमाइश आ जाती है तो कभी किसी के एक पैर का मोजा नहीं मिलता." ये नेहा की शिकायत है.

क्या चाहती हैं ये औरतें

उमा को सबसे ज़्यादा ग़ुस्सा तब आता है जब लोग उन्हें सीरियल देखने के लिए ताना मारते हैं.

वो कहती हैं, "दिन-रात काम करते हैं. थोड़ी देर सीरियल देख भी लिया तो क्या आफ़त आ गई? इसी बहाने हमारा दिल बहल जाता है तो इसमें क्या तकलीफ़ है?"

तो ये औरतें चाहती क्या हैं?

थोड़ी सी तारीफ़, थोड़ी सी इज़्जत और थोड़ा सा प्यार.

उमा, काजल, पूनम, सुनीता और नेहा एक-एक करके जवाब देती हैं.

काजल कहती हैं, "हम जो काम करते हैं वो सैलरी से कहीं ऊपर का है. आप बस इस सच को कबूल लें, इतना ही हमारे लिए काफ़ी होगा.

वैसे अगर मोटा-मोटा अनुमान लगाया जाए तो भी होममेकर्स को कम कम से कम 45-50 हज़ार रुपए महीने मिलने चाहिए.

ब्रिटन में ऑफ़िस फ़ॉर नेशनल स्टैटिस्टिक्स (ONS) की रिपोर्ट (2014) के मुताबिक़ अगर सिर्फ़ घरों में लॉन्ड्री (कपड़े धोने और उनके रखखाव) को गिना जाए तो इसकी क़ीमत 97 अरब से ज़्यादा होगी यानी ब्रिटेन की जीडीपी का 5.9%.

कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि गृहणियों को उनके काम के पैसे भले न मिलते हों लेकिन इन्हें आर्थिक गतिविधियों का हिस्सा माना जाना चाहिए.

Wednesday, 25 April 2018

कर्ब चेहरों पे सजाते हुए मर जाते हैं - मालिकज़ादा जावेद

कर्ब चेहरों पे सजाते हुए मर जाते हैं

हम वतन छोड़ के जाते हुए मर जाते हैं

ज़िंदगी एक कहानी के सिवा कुछ भी नहीं

लोग किरदार निभाते हुए मर जाते हैं

उम्र-भर जिन को मयस्सर नहीं होती मंज़िल

ख़ाक राहों में उड़ाते हुए मर जाते हैं

कुछ परिंदे हैं जो सूखे हुए दरियाओं से

इल्म की प्यास बुझाते हुए मर जाते हैं

ज़िंदा रहते हैं कई लोग मुसाफ़िर की तरह

जो सफ़र में कहीं जाते हुए मर जाते हैं

उन का पैग़ाम मिला करता है ग़ैरों से मुझे

वो मिरे पास ख़ुद आते हुए मर जाते हैं

जिन को अपनों से तवज्जोह नहीं मिलती 'जावेद'

हाथ ग़ैरों से मिलाते हुए मर जाते हैं

Tuesday, 24 April 2018

वक्त का वक्त क्या है पता कीजिए - कुमार अरविन्द

 गजल : कुमार अरविन्द

वक्त का वक्त क्या है पता कीजिए |
बाखुदा हूं ‘ खुदा बाखुदा कीजिए |

दर्दे – दिल आज मेरे मुखालिब रहे |
सुखनवर से उन्हें ‘ आशना कीजिए |

चांद तक की अदा कुछ सँवर जायेगी |
अश्क आंखों से गर आबशा कीजिए |

कल्बे – रहबर इनायत बनी गर रहे |
चंद – लम्हों में फिर राब्ता कीजिए |

मशवरा ये हुकूमत तुम्हीं से लेगी |
नौजवानों खड़ा ‘ काफिला कीजिए |

जब वरक लफ्ज तेरे आगोश मे हैं |
दर्दे दिल लिख के ही रतजगा कीजिए |

मुझको अरविन्द हर सू नजर आते हैं |
मोजिज़ा ही सही मोजिज़ा कीजिए |

बाखुदा – खुदा के लिए , मुख़ालिब – आमने सामने , सुखनवर – शायर , आशना – परिचय , आबशा/आबशार – झरना , कल्बे रहबर – पथप्रदर्शक की पहले , राब्ता – मुलाकात , वरक – पन्ना , मोजिज़ा – चमत्कार

Monday, 23 April 2018

धुआँ बना के फ़ज़ा में उड़ा दिया मुझ को - नज़ीर बाक़री

धुआँ बना के फ़ज़ा में उड़ा दिया मुझ को

मैं जल रहा था किसी ने बुझा दिया मुझ को

तरक़्क़ियों का फ़साना सुना दिया मुझ को

अभी हँसा भी न था और रुला दिया मुझ को

मैं एक ज़र्रा बुलंदी को छूने निकला था

हवा ने थम के ज़मीं पर गिरा दिया मुझ को

सफ़ेद संग की चादर लपेट कर मुझ पर

फ़सील-ए-शहर पे किस ने सजा दिया मुझ को

खड़ा हूँ आज भी रोटी के चार हर्फ़ लिए

सवाल ये है किताबों ने क्या दिया मुझ को

न जाने कौन सा जज़्बा था जिस ने ख़ुद ही 'नज़ीर'

मिरी ही ज़ात का दुश्मन बना दिया मुझ को

Saturday, 21 April 2018

अरमान - रामनरेश त्रिपाठी

है शौक यही, अरमान यही
हम कुछ करके दिखलाएँगे,
मरने वाली दुनिया में हम
अमरों में नाम लिखाएँगे।
जो लोग गरीब भिखारी हैं
जिन पर न किसी की छाया है,
हम उनको गले लगाएँगे
हम उनको सुखी बनाएँगे।
जो लोग अँधेरे घर में हैं
अपनी ही नहीं नजर में हैं,
हम उनके कोने कोने में
उद्यम का दीप जलाएँगे।
जो लोग हारकर बैठे हैं
उम्मीद मारकर बैठे हैं,
हम उनके बुझे दिमागों में
फिर से उत्साह जगाएँगे।
रोको मत, आगे बढ़ने दो
आजादी के दीवाने हैं,
हम मातृभूमि की सेवा में
अपना सर्वस्व लगाएँगे।
हम उन वीरों के बच्चे हैं
जो धुन के पक्के-सच्चे थे,
हम उनका मान बढायेंगे
हम जग में नाम कमाएँगे।
- रामनरेश त्रिपाठी

ज़बाँ रखता हूँ लेकिन चुप खड़ा हूँ - मोहसिन नक़वी

ज़बाँ रखता हूँ लेकिन चुप खड़ा हूँ

मैं आवाज़ों के बन मैं घिर गया हूँ

मिरे घर का दरीचा पूछता है

मैं सारा दिन कहाँ फिरता रहा हूँ

मुझे मेरे सिवा सब लोग समझें

मैं अपने आप से कम बोलता हूँ

सितारों से हसद की इंतिहा है

मैं क़ब्रों पर चराग़ाँ कर रहा हूँ

सँभल कर अब हवाओं से उलझना

मैं तुझ से पेश-तर बुझने लगा हूँ

मिरी क़ुर्बत से क्यूँ ख़ाइफ़ है दुनिया

समुंदर हूँ मैं ख़ुद में गूँजता हूँ

मुझे कब तक समेटेगा वो 'मोहसिन'

मैं अंदर से बहुत टूटा हुआ हूँ

Friday, 20 April 2018

दिल था कि फिर बहल गया, जाँ थी कि फिर संभल गई!

-त्रिभुवन ||
वह लंदन से पत्र लिख रहा था।
प्रसून भाई, कॉमनवेल्थ हेड्स ऑफ़ गवर्नमेंट मीटिंग (चोगम) सम्मेलन का इस तरह फ़ायदा उठवाने के लिए तुम्हें अपने हृदय तल से कितना साधुवाद दूं! मेरे पास शब्द नहीं हैं। मेरे यार तुमने तो कमाल कर दिया। साला मैं तो कच्ची कैरियों को आम बताकर बेचने में उस्ताद था, तुमने तो यार गुठलियां की गुठलियां ही अल्फ़ांज़ो बताकर टिका दीं! मान गए गुरू!
प्रसून, तुम्हारी वो एक कविता है ना….शर्म आ रही है ना! यार इस वक़्त मुझे बहुत याद आ रही है। लेकिन शीर्षक के बाद ऐसा लगता है कि यह कविता इसी पंक्ति पर ख़त्म हो जानी चाहिए। तुमने वेस्टमिंस्टर के सेंट्रल हॉल से जिस तरह लंदन में बैठे लाेगों के माथे पर तिलक लगवाया और उनके दिमाग़ों का जिस तरह मुरब्बा बनाया, वह कमाल की अदा थी। आैर ये तुम जानते ही हो कि ये सब वे प्रवासी थे, जो अंगरेज़ के वापस चले जाने के बाद हिन्दुस्तान में अपनी रूह को ग़मज़दा देखकर उनके पीछे-पीछे चले गए थे।
मुझे इस वक़्त वो पाकिस्तानी (हां-हां, वह घटिया मुल्क़, जैसा कि तुमने एक सवाल पूछकर साबित भी किया कि हमने कैसे सर्जिकल स्ट्राइक करके क़ीमा बना दिया) शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का शेर याद आ रहा है : शाम-ए-फ़िराक़ अब न पूछ आई और आ के टल गई दिल था कि फिर बहल गया जाँ थी कि फिर सँभल गई! सच में उस्ताद, पैसा तो लगा, लेकिन मज़ा आ गया। ये जो आरिफ़ा-वारिफा, उन्नाव-वुन्नाव, नोटबंदी-ओटबंदी जैसे वाहियात से मामलों के कारण विपक्ष वाले जो हालात ख़राब कर रहे थे ना, उनसे कुछ सांस मिल गई।
सच कहता हूं, कई दिन से साला दिमाग का दही हो रहा था तुमने जैसे बज़्म-ए-ख़याल में हुस्न की शमां सी जला दी। क़माल हो या क़माल। फ़िल्मी गीतकारों के इतिहास में आज तक जो कुछ ग़ुलज़ार और जावेद अख़्तर जैसे लोग सोच भी नहीं पाए, तुमने तो उससे आगे भी नए जहां तलाश लिये। सच में मैकेन एरिकसन ने तुम्हारी प्रतिभा को ठीक ही पहचाना।
प्रसून यार, अपनी तबियत प्रसन्न हो गई। दर्द जितना भी था, चांद बनकर चमक उठा। वो हिज़्र की रातों की सी बेचैनी को तुमने धो-पौंछ दिया। मैं लंदन में सुबह उठा तो हृदय गदगद हो गया। अप्रैल की ये सुहानी सुबह मचल-मचलकर महक-महक कर मुझे बांहों में भर रही थी। तुमने तो मेरे यार सारे हालात ही बदल दिए। आज तो एक नई सुबह थी और नई सबा थी।
वो क़मीना पत्रकार तो इसे ‘अवेक इन लंदन, अनअवेयर इन इंडिया’ नाम देकर मज़ाक उड़ा रहा था, लेकिन तूने प्रसून सारे पैसे वसूल करवा दिए। मैं इतना खुश हूं कि बयान नहीं कर सकता। क्या-क्या बुलवा दिया तुमने मुझसे। मेरी सरकार की ख़ूब आलोचना की जानी चाहिए। आख़िर हम लोकतंत्र में रहते हैं। मैं भी आप जैसा ही आदमी हूं और मुझ में भी वही कमियां हो सकती हैं, जो आप में हैं। क्या रे यार। तूने तो परेश रावल को भी पीछे छोड़ दिया। क्या खूब तो प्लाॅट, क़माल स्टोरी, म्युजिक और शानदार स्क्रीनप्ले! ग़ज़ब बंदे हो यार। कहां तो शेख़ साहब के इक़राम में आज तक जो शय हराम थी, उसी को तुमने राहते-जां बना डाला। तुमने यार जो पब्लिक रिलेशंस की टर्म को जर्नलिज्म और पॉलिटक्स के जिस हॉट डॉग में बदला है ना, वह सच में संजीव कपूर जैसे लोग भी कुछ नहीं कर सकते। हां, इससे याद आया, तुम अब पब्लिक रिलेशंस और पाेएट्री का कोई फ्यूजन करके सैफ्रॉन चिल्ली रेस्टॉरेंट भी चला सकते हो!
प्रसून, तुमने किस तरह सबको एक साथ कैसे-कैसे साधा। मैं तो मन ही मन हंस-हंसकर लोटपाेट हो रहा था कि तुमने एक गुजराती को चूसी हुई गुठली दी और वह आंखों में आंसू भरकर उसे केसर आम समझकर ले गया। और वह तो और भी कमाल था। वो कर्नाटक वाला तो गुठली को तोतापुरी समझकर ही चूसता-चूसता सम्मेलन से बाहर निकला। ये आम की गुठलियों का इतना शानदार प्रयोग तुमने कहां सीखा मित्र? वो हिमाचल वाले को तुमने जैसे ही गुठली दी, मुझे लगा एक बार कि ये तो वॉमिट कर देगा, लेकिन क्या देखता हूं, वह तो चोसा समझकर लपालप चूसने लगा। और यार वो यूपी वाले दोनों बुड्ढ़े तो गुठलियों को ऐसे बटोर ले गए जैसे लंगड़े और दशहरी की ताज़ा कटी फांकें हों। मुझे तो वो बंगाली और महाराष्ट्रियन पर हंसी आ रही है। दोनों भाई गुठलियों को अल्फ़ांजों और हिमसागर समझकर टूट पड़े। वो आंध्र वाला भाई तो बची-खुची गुठलियों को बंगनपल्ली समझकर ही फ़िदा था! यार, प्रसून तुम वाकई में भारत रत्न हो! अगली बार अपनी सरकार आ गई तो अपना ये वादा रहा कि तेरे को भारत-रत्न पक्का! बस तू मेरे लिए इस देश के हर मतदाता को भाग मिल्खा भाग की तरह ईवीएम की तरफ दौड़ाता रह! दोस्त, तू ही है अब। तू मेरी पार्टी के किसी बंदे के दिल को लहू कर या किसी और का, या अपना ही कर, लेकिन मेरा गरेबाँ तो रफ़ू कर!
तुुम्हारा
मैं
…और वहीं कहीं फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ या पता नहीं किसी और की आत्मा भी भटक रही थी। वह गुनगुना रही थी : बिखरी इक बार तो हाथ आई है कब मौज-ए-शमीम, दिल से निकली है तो कब लब पे फ़ुग़ाँ ठहरी है!

Friday, 13 April 2018

वक्त से हालात से नज़रें मिलाना सीख लो

सतीश बंसल 

वक्त से हालात से नज़रें मिलाना सीख लो
मुश्किलों को साज करके गीत गाना सीख लो

हार जायेगी यकींनन हार इक दिन देखना
हौसला अपना अगर तुम ख़ुद बढा़ना सीख लो

दौर में खुदगर्जियों के ये ज़रूरी है बहुत
तुम भरोसे को सभी के आजमाना सीख लो

इश्क पर पाबंदियाँ हैं बोलना भी है मना
बात दिल की अब निगाहों से बताना सीख लो

चाहते हो फैन लाखों हों तुम्हारे भी अगर
आँख भौहें तुम अदाओं से चलाना सीख लो

चाहिये कद में उँचाई तो करो ये काम तुम
नेकियाँ करते रहो सर को झुकाना सीख लो

कौन होता है किसी के आँसुओं से ग़मज़दा
फायदा बस है इसी में मुस्कुराना सीख लो

सतीश बंसल

Tuesday, 3 April 2018

ग़ज़ल - रंगमंच की डोर


रंममंच की डोर खिंची तो, नाम सभी बदनाम मिले,
कुछ झंडों में छिपे हुए कुछ सिक्कों में नीलाम मिले।

थाम के उँगली हमने जिनकी, ईश्वर को पाना चाहा
उनके चर्चे, गली-गली में, कौड़ी-कौड़ी दाम मिले।

वतनफरोशों की आँखों में, झाँक रूह भी काँप उठी
एक तिरंगे के टुकड़े में, लिपटे रहमत-राम मिले।

प्यार-मोहब्बत,भाई-चारे की महँगी दुकानों पर
बड़े ही सस्ते खूनी खंजर नफरत के पैगाम मिले।

भक्त समझकर जब जा पहुँचे ,बहुरुपियों की बस्ती में
कंठीमाला हाथ में थामे , सौ-सौ आसाराम मिले।

नमकहलाली क्या होती है, उन्हें सिखाना बड़ा कठिन
जहाँ विभीषण की सूरत में, व्यक्ति नमकहराम मिले।

घर, मरघट को समझ के हमने, भूल बड़ी नादानी की
यहाँ ‘शरद’ से जानेवाले कहते ‘सत्य हैं राम’ मिले।

— शरद सुनेरी

Monday, 2 April 2018

एक शाम मुझे तुम मिल जाओ

एक शाम मुझे तुम मिल जाओ
कुछ बातेँ तुमसे करनी हैँ,
उजली-धुँधली तस्वीरों की
कुछ यादें ताजा करनी हैँ.........१
वो बाग-बग़ीचों में मिलना
खेतों-खलिहानों में मिलना,
वो आमों के बागों वाली
पगडंडी फिर से चलनी है,
एक शाम मुझे तुम मिल जाओ
कुछ बातेँ तुमसे करनी हैँ............२
वो छुप-छुप कर तुमसे मिलना
क्यारी में फूलों का खिलना,
वो महुआ की महकती डाली
आज फ़िर से पकड़नी है,
एक शाम मुझे तुम मिल जाओ
कुछ बातें तुमसे करनी हैँ...........३
वो नदिया के गीले तट पर
साँझ ढले का अँधियारा,
वो सरसों के खेतों की मेड़ो वाली
तँग राह फिर से गुजरनी है,
एक शाम मुझे तुम मिल जाओ
कुछ बातें तुमसे करनी हैँ.............४
वो नीम के फूलों का गुच्छा
गेंहू की भुनी हुयी बाली,
वो गाँव के कुयें में पानी वाली
तेरी मटकी फिर से पकड़नी है,
एक शाम मुझे तुम मिल जाओ
कुछ बातेँ तुमसे करनी हैँ.............५
वो गाँव की हाट का कच्चा रास्ता
सावन में मेलों के झूले,
तीखे-तीखे चाट-पकौड़े
वो मिर्ची फिर से चखनी है,
एक शाम मुझे तुम मिल जाओ
कुछ बातेँ तुमसे करनी हैं..........६
वो मन्दिर के पिछवारे में
खण्डहर की टूटी दीवारें,
मख़मल के घास बिछौने पे
ढलते सूरज की अगुवाई फिर से करनी है,
एक शाम मुझे तुम मिल जाओ
कुछ बातें तुमसे करनी हैँ..............७
वो नहर का छोटा सा पुल
पानी पे सूरज की किरणें,
मेरी रफ़ कॉपी से बनी
कागज़ की नाव चलानी है,
एक शाम मुझे तुम मिल जाओ
कुछ बातेँ तुमसे करनी हैँ.............८
वो इमली के पेड़ों की खटास
अमरूद के मौसम की मिठास,
वो बेरों के काँटो की चुभन
मुझे गालों पे फिर से सहनी हैँ,
एक शाम मुझे तुम मिल जाओ
कुछ बातेँ तुमसे करनी हैँ..............९
वो चिड़ियों सँग आवारा पन
बादल का बंजारा पन,
वो हवा में उड़ती लाल पतंग
तेरे लिये पकड़ कर लानी है,
एक शाम मुझे तुम मिल जाओ
कुछ बातेँ तुमसे करनी हैँ..........१०
तूने अपनी नादानी में
जो चीजें मुझस छीनी हैँ,
जब साथ था अपना हरदम का
वो ज़िन्दगी फिर से जीनी है,
एक शाम मुझे तुम मिल जाओ
कुछ बातेँ तुमसे करनी हैँ...........११

Friday, 30 March 2018

शोहर हो तुम उसके कोई खरीदार नहीं

शोहर हो तुम उसके कोई खरीदार नहीं..
तुम्हारे घर का बिस्तर हैं ये कोई रंगरंगेलियों का बाजार नहीं...

कभी तो जरा प्यार से उसकी रजामंदी को  टटोल लो ना..
मत बनाओ उसकी बेबसी को हर रात.. अपने तलब का खिलोना..

क्योंकि बीवी हुई तो क्या हुआ... हैं  तो वो भी इंसान...   दर्द तो उसे भी होता हैं ना.....

हाँ, जानती हूँ तुम यहीं कहोगे कि
उसके जिस्म के हर कतरे पे तुम्हारा हक हैं..
पर उसकी तकलीफों को समझना  ये भी तो तुम्हारा ही फर्ज हैं ना...

और एहतराम का रिश्ता होता हैं ये जनाब.. ना कि एक बार में वसूल कर लेने वाला कोई कर्ज..
तुम उसकी डरी सहमी सी चुपी को मर्जी ना मान लिया करो ना..

क्योंकि बीवी हुई तो क्या हुआ... हैं तो वो भी इंसान.. दर्द तो उसे भी होता हैं  ना....

इतना तो तुम भी जानते हो ना
वो तो अपनी आपबीती भी किसी से कह सकती नहीं ना...
बस अपनी दर्द भरी सिसकियों से सब सह जाती हैं वो
क्योंकि ये मामला ही बहुत अंदरूनी सा हैं ना...

पर सिर्फ जिस्म को रौंदने के लिये होता तो कोई निकाह नहीं ना..
एक बार तो पुछ लो आज उसकी हाँ हैं या ना हैं...
अगर जो हो उसकी ना भी तो.. जरा बालों को सहला कर अपनी बाहों में सुला लो ना...
जरूरी तो नहीं हर रोज बस उसके जिस्म से ही खेलना...
क्योंकि जनाब बीवी हुई तो क्या हुआ हैं तो वो भी इंसान.. दर्द तो उसे भी होता हैं Marriage is not an excuse of rape.. Please respect her feelings nd emotions she is your wife not a slave...  #speakagainstwrong #maritalrape #standagainstrape

Thursday, 29 March 2018

हमराही - Quote by Ravindra Gangwar

भटकते हैं जो गलियों में जीने के लिए !
वो मुसाफिर नहीं, हमराही हैं !!
धिक्कारते हो तुम जिसे, भूलकर अपनी आवो-हवा !
हकदार इस जहां का उनका ही गुरूर है !!