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Tuesday, 1 May 2018

गज़ल - जिसे हालात ने मारा हो मुहब्बत कैसे वो कर ले

जिसे हालात ने मारा हो मुहब्बत कैसे वो कर ले,
जो खुद टूटा सितारा हो मुहब्बत कैसे वो कर ले,
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सहारा देना पड़ता है इक दूजे को मुश्किल में,
जो खुद ही बेसहारा हो मुहब्बत कैसे वो कर ले,
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जीने के लिए छत भी ज़रूरी होती है सर पर,
जो खुद बेघर बेचारा हो मुहब्बत कैसे वो कर ले,
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जीत है लाज़िमी शतरंज की बाज़ी हो या दिल की,
जो खुद दुनिया से हारा हो मुहब्बत कैसे वो कर ले,
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ना कोई राह ना मंज़िल ना जीने का कोई मकसद,
जो खुद बादल आवारा हो मुहब्बत कैसे वो कर ले,
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आभार सहित :- भरत मल्होत्रा।

Monday, 30 April 2018

ठुकराओ अब कि प्यार करो मैं नशे में हूँ - शाहिद कबीर

ठुकराओ अब कि प्यार करो मैं नशे में हूँ

जो चाहो मेरे यार करो मैं नशे में हूँ

अब भी दिला रहा हूँ यक़ीन-ए-वफ़ा मगर

मेरा न ए'तिबार करो मैं नशे में हूँ

अब तुम को इख़्तियार है ऐ अहल-ए-कारवाँ

जो राह इख़्तियार करो मैं नशे में हूँ

गिरने दो तुम मुझे मिरा साग़र संभाल लो

इतना तो मेरे यार करो मैं नशे में हूँ

अपनी जिसे नहीं उसे 'शाहिद' की क्या ख़बर

तुम उस का इंतिज़ार करो मैं नशे में हूँ

Tuesday, 24 April 2018

तन्हा दिल की दीवारों पर - अंजु गुप्ता

 तन्हा दिल की दीवारों पर
कुछ परछाइयां मंडराती हैं !
कभी छेड़ें दिल के तारों को,
कभी एकाँकी कर जाती हैं ! !

कभी पंख लगा के हसरतें,
अल्हड़पन में पहुंच जाती हैं !
खुशियों भरी प्यारी राहें,
फिर वापिस मुझे बुलाती हैं ! !

कुछ अनुत्तरित बातें जीवन की
अस्तित्व मेरी झुठलाती हैं !
आँखों की नमी ओढ़ मुस्कुराहट,
फिर बेचैनी मेरी छुपातीं हैं ! !

क्यों दिल की दीवारों पर
कुछ परछाइयां मंडराती हैं !
क्यों छेड़ें दिल के तारों को,
क्यों एकाँकी कर जाती हैं ! !

अंजु गुप्ता

दिल में नफरत थी मुहब्बत ही सजा ली हमने - कुमार अरविन्द

 रोग जाता ही नहीं कितनी दवा ली हमने
माँ के क़दमों में झुके और दुआ ली हमने
इस ज़माने ने सताया भी बहुत है मुझको
आग ये सीने की अश्कों से बुझा ली हमने
जब नजर आई नहीं ख्वाब में माँ की सूरत
अपनी आंखों से हर इक नींद हटा ली हमनें
देखने तो आज सभी आये तमाशा मेरा
जब से दीवार घरों में ही उठा ली हमने
तेरी चाहत में हुआ है हाल दिवानों जैसा
अपनी पगड़ी ही सरे आम उछाली हमनें
हर तरफ ही यूं नजर आने लगी उल्फ़त जब
दिल में नफरत थी मुहब्बत ही सजा ली हमने
खत्म हो जाये न ये दौर मुलाकातों का
ज़िंदगी बस तेरे वादे पे बिता दी हमने
माँ के क़दमों में ये सारा ही जहां दिखता है
बस तेरी याद में हस्ती भी मिटा ली हमने
खौफ था मुझको चरागों से ही घर जलने का
आग ‘अरविन्द’ घरों में ही लगा ली हमने

— कुमार अरविन्द

Thursday, 19 April 2018

स्मृतियों ने साथ न छोड़ा – आलोक यादव


स्मृतियों ने साथ न छोड़ा

मनबसियों ने साथ न छोड़ा

धुंधले हुए चित्र बचपन के

कौन सुनाए परीकथाएं

ऐसी नींद नहीं आती अब

जिन में फिर वो सपने आएं

पर सपनों में जो आती थीं

उन परियों ने साथ न छोड़ा

जीवन की आपाधापी में

जाने कितने साथी छूटे

जग में मनभावन उपवन के

छूटे कितने ही गुलबूटे

जिन की गंध बसी थी मन में

उन कलियों ने साथ न छोड़ा

यायावर हम निपट अकेले

रह पाए किस घर के हो के

चौखट ऐसी कोई नहीं थी

कर मनुहार हमें जो रोके

पर हम साथ जहां चलते थे

उन गलियों ने साथ न छोड़ा.

– आलोक यादव

खुशबुओं का कहाँ ठिकाना है - नीरज निश्चल

 हर तरफ फैलते ही जाना है ।
खुशबुओं का कहाँ ठिकाना है ।

हमसफ़र आप सा मिले जिसको,
उसका तो हर सफर सुहाना है ।

हमने पूछा कि ज़िन्दगी क्या है,
उसने बोला कि मुस्कराना है ।

आपको हर खुशी मुबारक हो,
हर दुआ का यही तराना है ।

किस्सा ए ज़िन्दगी अगर समझो,
कुछ हकीकत है कुछ फ़साना है ।

देख कर जिसको जान जाती है,
ज़िन्दगी का वही बहाना है ।

नीरज निश्चल

सोचा करता हूँ - नीरज निश्चल 

सोचा करता हूँ मै तेरा ओहदा  रब से कम क्या होगा ।
हिज़्र में जब है इतनी लज्जत वस्ल का आलम क्या होगा ।

इश्क के पहलू में तो खिजां भी नूर खिलाती है दिल में,
ये मेरा भगवान ही जाने फूलों का मौसम क्या होगा ।

माना तेरी खबर नहीं कुछ लेकिन मै बेखबर नहीं,
अपना हाल बता देता है हाले हमदम क्या होगा ।

रहकर मुझसे दूर तू साथी मेरे कितने पास भी है,
इस दुनिया मे कोई तुझसा मेरा महरम क्या होगा ।

‘नीरज’ जिसकी राहों में ये लुत्फे जीवन पाया है,
तड़प उठा हूँ सोच के उस मंजिल का संगम क्या होगा ।

नीरज निश्चल

Monday, 2 April 2018

गजल - नवीन मणि त्रिपाठी

‘इस चमन में शजर चन्द  ऐसे रहे ।
जो सदा ज़ुल्म तूफ़ाँ का सहते रहे।।

घर हमारा रकीबों ने लूटा बहुत ।
और वे आईने में सँवरते रहे ।।

था तबस्सुम का अंदाज ही इस तरह ।
लोग कूंचे से उनके निकलते रहे ।।

देखकर जुल्फ को होश क्यों खो दिया ।
आपके तो इरादे बहकते रहे ।।

दिल लगाने से पहले तेरे हुस्न को ।
जागकर रात भर हम भी पढ़ते रहे ।।

यह मुहब्बत नहीं और क्या थी सनम ।
लफ्ज़ खामोश थे बात करते रहे ।।

कैसे कह दूं कि मुझसे जुदा आप हैं ।
ख्वाब में आप तो रोज़ मिलते रहे ।।

कुछ तो साजिश मुहब्बत में थी आपकी ।
बेसबब आप क्यूँ मुझको छलते रहे ।।

खुदकुशी कर लूं हम ये है मुमकिन कहाँ ।
जिंदगी के लिए हम  तरसते रहे ।।

मैं सजा लेता पलकों में तुमको मगर ।
इश्क में तुम भी चेहरे बदलते रहे ।।

कुछ शरारत लिए थीं वो अंगड़ाइयां ।
देखकर उम्र भर  हम  मचलते रहे ।।

कर गयी जो असर आपकी वह नजर ।
आज तक बेखुदी में टहलते रहे ।।

दो बदन जल उठे आग ऐसी लगी ।
मुद्दतों बाद हम भी सुलगते रहे ।।

–नवीन मणि त्रिपाठी

एक शाम मुझे तुम मिल जाओ

एक शाम मुझे तुम मिल जाओ
कुछ बातेँ तुमसे करनी हैँ,
उजली-धुँधली तस्वीरों की
कुछ यादें ताजा करनी हैँ.........१
वो बाग-बग़ीचों में मिलना
खेतों-खलिहानों में मिलना,
वो आमों के बागों वाली
पगडंडी फिर से चलनी है,
एक शाम मुझे तुम मिल जाओ
कुछ बातेँ तुमसे करनी हैँ............२
वो छुप-छुप कर तुमसे मिलना
क्यारी में फूलों का खिलना,
वो महुआ की महकती डाली
आज फ़िर से पकड़नी है,
एक शाम मुझे तुम मिल जाओ
कुछ बातें तुमसे करनी हैँ...........३
वो नदिया के गीले तट पर
साँझ ढले का अँधियारा,
वो सरसों के खेतों की मेड़ो वाली
तँग राह फिर से गुजरनी है,
एक शाम मुझे तुम मिल जाओ
कुछ बातें तुमसे करनी हैँ.............४
वो नीम के फूलों का गुच्छा
गेंहू की भुनी हुयी बाली,
वो गाँव के कुयें में पानी वाली
तेरी मटकी फिर से पकड़नी है,
एक शाम मुझे तुम मिल जाओ
कुछ बातेँ तुमसे करनी हैँ.............५
वो गाँव की हाट का कच्चा रास्ता
सावन में मेलों के झूले,
तीखे-तीखे चाट-पकौड़े
वो मिर्ची फिर से चखनी है,
एक शाम मुझे तुम मिल जाओ
कुछ बातेँ तुमसे करनी हैं..........६
वो मन्दिर के पिछवारे में
खण्डहर की टूटी दीवारें,
मख़मल के घास बिछौने पे
ढलते सूरज की अगुवाई फिर से करनी है,
एक शाम मुझे तुम मिल जाओ
कुछ बातें तुमसे करनी हैँ..............७
वो नहर का छोटा सा पुल
पानी पे सूरज की किरणें,
मेरी रफ़ कॉपी से बनी
कागज़ की नाव चलानी है,
एक शाम मुझे तुम मिल जाओ
कुछ बातेँ तुमसे करनी हैँ.............८
वो इमली के पेड़ों की खटास
अमरूद के मौसम की मिठास,
वो बेरों के काँटो की चुभन
मुझे गालों पे फिर से सहनी हैँ,
एक शाम मुझे तुम मिल जाओ
कुछ बातेँ तुमसे करनी हैँ..............९
वो चिड़ियों सँग आवारा पन
बादल का बंजारा पन,
वो हवा में उड़ती लाल पतंग
तेरे लिये पकड़ कर लानी है,
एक शाम मुझे तुम मिल जाओ
कुछ बातेँ तुमसे करनी हैँ..........१०
तूने अपनी नादानी में
जो चीजें मुझस छीनी हैँ,
जब साथ था अपना हरदम का
वो ज़िन्दगी फिर से जीनी है,
एक शाम मुझे तुम मिल जाओ
कुछ बातेँ तुमसे करनी हैँ...........११

Friday, 30 March 2018

*दूर होते चले गए *

*दूर होते चले गए *

बेनूर करके मेरे चेहरे को, वो पुरनूर होते चले गए,
मैं तन्हा रह गया इंसानों सा, वो हूर होते चले गए।

मैं गुज़रता रहा अपनी हद से, ख़ुमारियों में इश्क़ की,
हुआ यूँ फिर मुझसे कि, कई क़ुसूर होते चले गए।

ना होती है मोहब्बत शर्त पर, ये तो ख़बर थी मुझको भी,
पर गर्दिश में था वो वक़्त जब, शर्त मंजूर होते चले गए।

उनकी ख़्वाहिशों के आगे, दिल मेरी सुनता ही कब था,
हम तो लाचार, बेबस दिल से, मजबूर होते चले गए।

सजदा किया था पत्थर-दिल का, ख़ुदा समझकर मैंने तो,
और फिर धीरे-धीरे वो नतीजतन, मगरूर होते चले गए।

मुझे लगा कि फ़ितरतन, वो सता रहें हैं मुझसे दूर जा,
इन्हीं ग़लतफ़हमियों में, मुझसे वो दूर होते चले गए।

पत्थर उछालना चाँद पर, आदत ये उसकी आम थी,
सारे ख़्वाब जो शीशों से थे, चकनाचूर होते चले गए।

मुसलसल वो करते रहे चोट, मेरे अध-घायल दिल पर,
ज़रा-ज़रा से ज़ख्म दिल के फिर, नासूर होते चले गए।

बेपरवाह मैं अपने दर्द से, तराशता रहा उसे अरसों,
मैं होता गया छलनी और वो कोहिनूर होते चले गए।

बदनाम 'अंश' होता गया, मैं शहर में उसके नाम से,
और वो शहर में मेरे नाम से, मशहूर होते चले गए।

~ कुमार सोनल 'अंश'

Wednesday, 28 March 2018

जाम नजरों के - Quote by Ravindra Gangwar

थोड़ा और करीब आओ ना, इश्क करने को जी चाहता है !
तुम जाम अपनी नजरों से पिलाना, मैं थोड़ा और बहक जाऊं !!

खामोशियां - Quote by Ravindra Gangwar

बर्बाद रातों के सिवा, अब कुछ नहीं पास मेरे !
बस खामोशियां हैं, और कुछ सिसकियां !!

Tuesday, 27 March 2018

Monday, 26 March 2018

हम मुसाफ़िर यूं ही मसरूफ़े सफ़र जाएंगे

हम मुसाफ़िर यूं ही मसरूफ़े सफ़र जाएंगे
बेनिशां हो गए जब शहर तो घर जाएंगे

किस क़दर होगा यहां मेहर-ओ-वफ़ा का मातम
हम तेरी याद से जिस रोज़ उतर जाएंगे

जौहरी बंद किए जाते हैं बाज़ारे-सुख़न
हम किसे बेचने अलमास-ओ-गुहर जाएंगे

नेमते-ज़ीस्त का ये करज़ चुकेगा कैसे
लाख घबरा के ये कहते रहें मर जाएंगे

शायद अपना ही कोई बैत हुदी-ख़्वां बनकर
साथ जाएगा मेरे यार जिधर जाएंगे

‘फ़ैज़’ आते हैं रहे, इश्क़ में जो सख़्त मक़ाम
आने वालों से कहो हम तो गुज़र जाएंगे

       ©®फैज अहमद फैज

Sunday, 19 November 2017

*जुदाई का एक ख़त*

*जुदाई का एक ख़त*

जानां!

जानती हो ,
रोज़ सोचता हूँ एक ख़त लिखूँ तुमको, वही ख़त जो मैंने अपने इश्क़ के पहले दिन से लिखना चाहा था। लेकिन कभी लिख नहीं पाया लेकिन सोच रहा हूँ आज लिखूँ, फिर अगले ही पल सोचता हूँ कि क्या वो खत कभी पहुँचा पाऊंगा तुमको और अगर कभी तुमको मिल भी गया तो क्या तुम पढ़ोगी उसको?
क्या तुम पढ़ पाओगी या यूँ कहूँ कि महसूस कर पाओगी उनको क्योंकि शब्दों को पढ़ा नही महसूस किया जाता है। क्या तुम महसूस कर पाओगी कि कितना अकेला हो गया हूँ मैं?

अगर मेरी इस लाइन को तुमने महसूस किया होगा तो मुझे शायद ये बताना नहीं पड़ेगा कि  कितना ज़्यादा अकेला हो गया हूँ मैं। कैसे बताऊँ कि कभी-कभी बहुत कुछ लिखना चाहता हूँ लेकिन पन्ने फटते हैं, कलम चलती है और कोई भी कहानी या कविता पूरी नहीं हो पाती क्योंकि शब्द तो खो गए हैं ना मेरे।

तुम जो खो गयी हो ना, जानती हो दिन बहुत उदास रहने लगे है मेरे और रात मुझे घूरती है हर रोज़ बुझने तक। बालकनी मेरी सबसे पसंदीदा जगह हो गयी है, कभी-कभी तो पूरी रात वहाँ बीत जाती है। हाँ, सच मे पूरी रात!

कभी कभी तो लैम्पपोस्ट के इन लाइटों से भी चिढ़ होती है, जी करता है कि फोड़ दूँ इनको। कभी मन करता है रोड पर चल रहे या आसपास रह रहे हर किसी से बात करूं और कभी सोचता हूँ कि इतना शांत हो जाऊं कि किसी की आवाज़ ही ना सुनाई दे, और सुनूँ तुम्हारी साथ की गयी हर बात को।

मुझे अपने आस पास की हर चीज़ महसूस होती है। नल से टिप-टिप रिसता पानी, घड़ी की टिक-टिक करती आवाज़, पंखे का शोर, अगर कुुछ नहींं सुनाई देती हैै तो तुम्हारे लौट आने की उम्मीद।

जानाँ, मैंने सच में सिर्फ तुमसे प्यार किया था सिर्फ तुमसे। तुम्हारे साथ बिताया हुआ हर एक पल एक फ़िल्म की तरह चलता रहता है आंखों के सामने, हाँ वही दो या तीन महीने ही जो तुमको बहुत कम समय लगा था और मुझे बहुत बड़ा क्योंकि उन दिनों को नहीं, मैंने तो पलों को जिया था ना। उन पलों को जिनमें तुम पास थी, साथ थी।

और भी बहुत कुछ है लिखने को जो मेरे शब्द समेट नहीं पा रहे, और कलम लिख नहीं पा रही, सो बस।

हाँ कभी कभी रो भी लेता हूँ, लड़के भी रोते हैं।
आज अकेलापन सारी सीमाएं पार कर रहा है।

सुनो ना! अगर हो सके तो लौट आओ मैं ये तो नहीं कहूंगा कि मैं दुनिया मे सबसे ज़्यादा प्यार दूंगा तुमको, लेकिन ये वादा है तुमसे कि मेरी दुनिया के सारे प्यार पर सिर्फ तुम्हारा हक़ होगा।

लौट आओ ना प्लीज़।

तुम्हारे खत के इंतज़ार में...

Thursday, 16 November 2017

Ravindra Gangwar quote

होगी मुलाकात उनसे मुमकिन नहीं लगता,
गर हैं दिल पास उसका एहसास तो हो !
धड़कने यूं उलझ कर रह गयीं उनके लफ्जों में,
करते हैं वो मुझसे प्यार फिर कोई जज्बात तो हो !!

Ravindra Gangwar quote

गमगीन दुनिया है उल्फत के नजारों की
जिसे देखो यहां सब इश्क के मारे हैं
गम-ए-मोहब्बत को लिए आंखों में
अश्कों से इक नई दास्तां लिखने को तैयार बैठे हैं
जज्बातों को सीने में दफन किए हुए
निकल पड़े हैं मंजिल को अपनी
बस इक उम्मीद के साथ
जिन्दगी के किसी मोड़ पर
महबूब उनका इन्तजार कर रहा होगा
पर वो भूल बैठे हैं
अन्जान हैं जानकर भी
छोड़ कर जाने वाले वापस नहीं आते
बस आती हैं तो उनकी यादें
और फिर गुम हो जाते हैं
उन यादों के साथ
तोड़ कर नाता इस दुनिया से.....

Wednesday, 1 November 2017

इश्क

हर लफ्ज लिख रहा हूं उसकी चाहत में!
और उसको खबर भी नहीं!!

मेरे साथ तो हैं उसकी यादें!
पर वो मेरा हमसफर नहीं!!

दीवाना हुआ हूं इश्क में उनके इस कदर!
और वो कहते हैं मैं तुम्हारा नहीं!!

अब तो तन्हा यूं ही गुजरती हैं रातें!
तेरे सिवा कोई और दिल को गंवारा नहीं!!

Tuesday, 31 October 2017

कागज़ की कश्ती

वो अक्सर मुझे खुदसे दूर रहने की हिदायत देती है, कहती है कि हम दोनों का कोई मेल नहीं है।

"मैं तेज़ बारिश हूँ और तुम कागज़, पास आओगे तो गल जाओगे।" वो मुझसे कहती है।

"कोई कागज़ का मामूली टुकड़ा नहीं, कागज़ की कश्ती हूँ मैं, तुम्हारे बिना मेरा कोई अस्तित्व है क्या? माना गलना ही है मुकद्दर मेरा, पर गलने से पहले कुछ देर साथ तो चल ही सकते हैं ना। अगर कागज़ की कश्ती बारिशों में गलने के डर से कभी पानी में ना उतरती तो उसके होने का कोई मतलब नहीं रहता, वो भी बाकि कागज़ों की तरह किसी रद्दी के ढेर में दफ़्न हो जाती या फिर अंत में किसी कूड़ेदान की भेंट चढ़ जाती। अब तुम ही बताओ, सालों किसी रद्दी के ढेर में सड़ते रहना अच्छा है या कुछ पल के लिए बारिश के पानी में उतरकर अपना सफ़र पूरा करना और मंज़िल आने पर शान से गलना। और गलने के बाद उसी पानी में समा जाना?
मैं रद्दी बनकर अपना जीवन नहीं काटना चाहता, तुम मुझे शान से गलने का मौका दोगी ना?" मैं उससे पूछता हूँ।

इतना सुनने के बाद मुझे उसकी आँखों का तूफ़ान शांत होता दिखता है। वो तेज़ बारिश है, इस तथ्य को मैं नकार नहीं सकता, पर आज उसकी आँखों में मुझे एक ठहराव नज़र आ रहा है। एक मद्धम ठहराव जो झील सा स्थिर नहीं है पर अब उनमें आँधी-तूफानों का वेग भी नहीं है। ठीक वैसा ही मद्धम बहाव है जैसा बारिशों के वक़्त होता है, पानी का वो मद्धम बहाव जिसमें अक्सर कागज़ की कश्तियाँ तैरती हैं।