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Friday, 18 May 2018

खोया हुआ सच - राजेंद्र जगोत्ता

एक लीला थी जिस का दिल जानवर के प्रति भी प्यार से पसीज जाता था और दूसरी तरफ सीमा थी, अपनों का दर्द जिस के मर्म को छूता न था. शायद यही वजह थी सीमा के दुख की.

सीमा रसोई के दरवाजे से चिपकी खड़ी रही, लेकिन अपनेआप में खोए हुए उस के पति रमेश ने एक बार भी पीछे मुड़ कर नहीं देखा. बाएं हाथ में फाइलें दबाए वह चुपचाप दरवाजा ठेल कर बाहर निकल गया और धीरेधीरे उस की आंखों से ओझल हो गया.
सीमा के मुंह से एक निश्वास सा निकला, आज चौथा दिन था कि रमेश उस से एक शब्द भी नहीं बोला था. आखिर उपेक्षाभरी इस कड़वी जिंदगी के जहरीले घूंट वह कब तक पिएगी?
अन्यमनस्क सी वह रसोई के कोने में बैठ गई कि तभी पड़ोस की खिड़की से छन कर आती खिलखिलाहट की आवाज ने उसे चौंका दिया. वह दबेपांव खिड़की की ओर बढ़ गई और दरार से आंख लगा कर देखा, लीला का पति सूखे टोस्ट चाय में डुबोडुबो कर खा रहा था और लीला किसी बात पर खिलखिलाते हुए उस की कमीज में बटन टांक रही थी. चाय का आखिरी घूंट भर कर लीला का पति उठा और कमीज पहन कर बड़े प्यार से लीला का कंधा थपथपाता हुआ दफ्तर जाने के लिए बाहर निकल गया.
सीमा के मुंह से एक ठंडी आह निकल गई. कितने खुश हैं ये दोनों… रूखासूखा खा कर भी हंसतेखेलते रहते हैं. लीला का पति कैसे दुलार से उसे देखता हुआ दफ्तर गया है. उसे विश्वास नहीं होता कि यह वही लीला है, जो कुछ वर्षों पहले कालेज में भोंदू कहलाती थी. पढ़ने में फिसड्डी और महाबेवकूफ. न कपड़े पहनने की तमीज थी, न बात करने की. ढीलेढाले कपड़े पहने हर वक्त बेवकूफीभरी हरकतें करती रहती थी.
क्लासरूम से सौ गज दूर भी उसे कोई कुत्ता दिखाई पड़ जाता तो बेंत ले कर उसे मारने दौड़ती. लड़कियां हंस कर कहती थीं कि इस भोंदू से कौन शादी करेगा. तब सीमा ने ख्वाब में भी नहीं सोचा था कि एक दिन यही फूहड़ और भोंदू लीला शादी के बाद उस की पड़ोसिन बन कर आ जाएगी और वह खिड़की की दरार से चोर की तरह झांकती हुई, उसे अपने पति से असीम प्यार पाते हुए देखेगी.
दर्द की एक लहर सीमा के पूरे व्यक्त्तित्व में दौड़ गई और वह अन्यमनस्क सी वापस अपने कमरे में लौट आई.
‘‘सीमा, पानी…’’ तभी अंदर के कमरे से क्षीण सी आवाज आई.
वह उठने को हुई, लेकिन फिर ठिठक कर रुक गई. उस के नथुने फूल गए, ‘अब क्यों बुला रही हो सीमा को?’ वह बड़बड़ाई, ‘बुलाओ न अपने लाड़ले बेटे को, जो तुम्हारी वजह से हर दम मुझे दुत्कारता है और जराजरा सी बात में मुंह टेढ़ा कर लेता है, उंह.’
और प्रतिशोध की एक कुटिल मुसकान उस के चेहरे पर आ गई. अपने दोनों हाथ कमर पर रख कर वह तन कर रमेश की फोटो के सामने खड़ी हो गई, ‘‘ठीक है रमेश, तुम इसलिए मुझ से नाराज हो न, कि मैं ने तुम्हारी मां को टाइम पर खाना और दवाई नहीं दी और उस से जबान चलाई. तो लो यह सीमा का बदला, चौबीसों घंटे तो तुम अपनी मां की चौकीदारी नहीं कर सकते. सीमा सबकुछ सह सकती है, अपनी उपेक्षा नहीं. और धौंस के साथ वह तुम्हारी मां की चाकरी नहीं करेगी.’’
और उस के चेहरे की जहरीली मुसकान एकाएक एक क्रूर हंसी में बदल गई और वह खिलाखिला कर हंस पड़ी, फिर हंसतेहंसते रुक गई. यह अपनी हंसी की आवाज उसे कैसी अजीब सी, खोखली सी लग रही थी, यह उस के अंदर से रोतारोता कौन हंस रहा था? क्या यह उस के अंदर की उपेक्षित नारी अपनी उपेक्षा का बदला लेने की खुशी में हंस रही थी? पर इस बदले का बदला क्या होगा? और उस बदले का बदला…क्या उपेक्षा और बदले का यह क्रम जिंदगीभर चलता रहेगा?
आखिर कब तक वे दोनों एक ही घर की चारदीवारी में एकदूसरे के पास से अजनबियों की तरह गुजरते रहेंगे? कब तक एक ही पलंग की सीमाओं में फंसे वे दोनों, एक ही कालकोठरी में कैद 2 दुश्मन कैदियों की तरह एकदूसरे पर नफरत की फुंकारें फेंकते हुए अपनी अंधेरी रातों में जहर घोलते रहेंगे?
उसे लगा जैसे कमरे की दीवारें घूम रही हों. और वह विचलित सी हो कर धम्म से पलंग पर गिर पड़ी.
थप…थप…थप…खिड़की थपथपाने की आवाज आई और सीमा चौंक कर उठ बैठी. उस के माथे पर बल पड़ गए. वह बड़बड़ाती हुई खिड़की की ओर बढ़ी.
‘‘क्या है?’’ उस ने खिड़की खोल कर रूखे स्वर में पूछा. सामने लीला खड़ी थी, भोंदू लीला, मोटा शरीर, मोटा थुलथुल चेहरा और चेहरे पर बच्चों सी अल्हड़ता.
‘‘दीदी, डेटौल है?’’ उस ने भोलेपन से पूछा, ‘‘बिल्लू को नहलाना है. अगर डेटौल हो तो थोड़ा सा दे दो.’’
‘‘बिल्लू को,’’ सीमा ने नाक सिकोड़ कर पूछा कि तभी उस का कुत्ता बिल्लू भौंभौं करता हुआ खिड़की तक आ गया.
सीमा पीछे को हट गई और बड़बड़ाई, ‘उंह, मरे को पता नहीं मुझ से क्या नफरत है कि देखते ही भूंकता हुआ चढ़ आता है. वैसे भी कितना गंदा रहता है, हर वक्त खुजलाता ही रहता है. और इस भोंदू लीला को क्या हो गया है, कालेज में तो कुत्ते को देखते ही बेंत ले कर दौड़ पड़ती थी, पर इसे ऐसे दुलार करती है जैसे उस का अपना बच्चा हो. बेअक्ल कहीं की.’
अन्यमनस्क सी वह अंदर आई और डेटौल की शीशी ला कर लीला के हाथ में पकड़ा दी. लीला शीशी ले कर बिल्लू को दुलारते हुए मुड़ गई और उस ने घृणा से मुंह फेर कर खिड़की बंद कर ली.
पर भोंदू लीला का चेहरा जैसे खिड़की चीर कर उस की आंखों के सामने नाचने लगा. ‘उंह, अब भी वैसी ही बेवकूफ है, जैसे कालेज में थी. पर एक बात समझ में नहीं आती, इतनी साधारण शक्लसूरत की बेवकूफ व फूहड़ महिला को भी उस का क्लर्क पति ऐसे रखता है जैसे वह बहुत नायाब चीज हो. उस के लिए आएदिन कोई न कोई गिफ्ट लाता रहता है. हर महीने तनख्वाह मिलते ही मूवी दिखाने या घुमाने ले जाता है.’
खिड़की के पार उन के ठहाके गूंजते, तो सीमा हैरान होती और मन ही मन उसे लीला के पति पर गुस्सा भी आता कि आखिर उस फूहड़ लीला में ऐसा क्या है जो वह उस पर दिलोजान से फिदा है. कई बार जब सीमा का पति कईकई दिन उस से नाराज रहता तो उसे उस लीला से रश्क सा होने लगता. एक तरफ वह है जो खूबसूरत और समझदार होते हुए भी पति से उपेक्षित है और दूसरी तरफ यह भोंदू है, जो बदसूरत और बेवकूफ होते हुए भी पति से बेपनाह प्यार पाती है. सीमा के मुंह से अकसर एक ठंडी सांस निकल जाती. अपनाअपना वक्त है. अचार के साथ रोटी खाते हुए भी लीला और उस का पति ठहाके लगाते हैं. जबकि दूसरी ओर उस के घर में सातसात पकवान बनते हैं और वे उन्हें ऐसे खाते हैं जैसे खाना खाना भी एक सजा हो. जब भी वह खिड़की खोलती, उस के अंदर खालीपन का एहसास और गहरा हो जाता और वह अपने दर्द की गहराइयों में डूबने लगती.
‘‘सीमा, दवाई…’’ दूसरे कमरे से क्षीण सी आवाज आई. बीमार सास दवाई मांग रही थी. वह बेखयाली में उठ बैठी, पर द्वेष की एक लहर फिर उस के मन में दौड़ गई. ‘क्या है इस घर में मेरा, जो मैं सब की चाकरी करती रहूं? इतने सालों के बाद भी मैं इस घर में पराई हूं, अजनबी हूं,’ और वह सास की आवाज अनसुनी कर के फिर लेट गई.
तभी खिड़की के पार लीला के जोरजोर से रोने और उस के कुत्ते के कातर स्वर में भूंकने की आवाज आई. उस ने झपट कर खिड़की खोली. लीला के घर के सामने नगरपलिका की गाड़ी खड़ी थी और एक कर्मचारी उस के बिल्लू को घसीट कर गाड़ी में ले जा रहा था.
‘‘इसे मत ले जाओ, मैं तुम्हारे हाथ जोड़ती हूं,’’ लीला रोतेरोते कह रही थी.
लेकिन कर्मचारी ने कुत्ते को नहीं छोड़ा. ‘‘तुम्हारे कुत्ते को खाज है, बीमारी फैलेगी,’’ वह बोला.
‘‘प्लीज मेरे बिल्लू को मत ले जाओ. मैं डाक्टर को दिखा कर इसे ठीक करा दूंगी.’’
‘‘सुनो,’’ गाड़ी के पास खड़ा इंस्पैक्टर रोब से बोला, ‘‘इसे हम ऐसे नहीं छोड़ सकते. नगरपालिका पहुंच कर छुड़ा लाना. 2,000 रुपए जुर्माना देना पड़ेगा.’’
‘‘रुको, रुको, मैं जुर्माना दे दूंगी,’’ कह कर वह पागलों की तरह सीमा के घर की ओर भागी और सीमा को खिड़की के पास खड़ी देख कर गिड़गिड़ाते हुए बोली, ‘‘दीदी, मेरे बिल्लू को बचा लो. मुझे 2,000 रुपए उधार दे दो.’’
‘‘पागल हो गई हो क्या? इस गंदे और बीमार कुत्ते के लिए 2,000 रुपए देना चाहती हो? ले जाने दो, दूसरा कुत्ता पाल लेना,’’ सीमा बोली.
लीला ने एक बार असीम निराशा और वेदना के साथ सीमा की ओर देखा. उस की आंखों से आंसुओं की धारा बह रही थी. सहसा उस की आंखें अपने हाथ में पड़ी सोने की पतली सी एकमात्र चूड़ी पर टिक गईं. उस की आंखों में एक चमक आ गई और वह चूड़ी उतारती हुई वापस कुत्ता गाड़ी की तरफ दौड़ पड़ी.
‘‘भैया, यह लो जुर्माना. मेरे बिल्लू को छोड़ दो,’’ वह चूड़ी इंस्पैक्टर की ओर बढ़ाती हुई बोली.
इंस्पैक्टर भौचक्का सा कभी उस के हाथ में पकड़ी सोने की चूड़ी की ओर और कभी उस कुत्ते की ओर देखने लगा. सहसा उस के चेहरे पर दया की एक भावना आ गई, ‘‘इस बार छोड़ देता हूं. अब बाहर मत निकलने देना,’’ उस ने कहा और कुत्ता गाड़ी आगे बढ़ गई.
लीला एकदम कुत्ते से लिपट गई, जैसे उसे अपना खोया हुआ कोई प्रियजन मिल गया हो और वह फूटफूट कर रोने लगी.
सीमा दरवाजा खोल कर उस के पास पहुंची और बोली, ‘‘चुप हो जाओ, लीला, पागल न बनो. अब तो तुम्हारा बिल्लू छूट गया, पर क्या कोई कुत्ते के लिए भी इतना परेशान होता है?’’
लीला ने सिर उठा कर कातर दृष्टि से उस की ओर देखा. उस के चेहरे से वेदना फूट पड़ी, ‘‘ऐसा न कहो, सीमा दीदी, ऐसा न कहो. यह बिल्लू है, मेरा प्यारा बिल्लू. जानती हो, यह इतना सा था जब मेरे पति ने इसे पाला था. उन्होंने खुद चाय पीनी छोड़ दी थी और दूध बचा कर इसे पिलाते थे, प्यार से इसे पुचकारते थे, दुलारते थे. और अब, अब मैं इसे दुत्कार कर छोड़ दूं, जल्लादों के हवाले कर दूं, इसलिए कि यह बूढ़ा हो गया है, बीमार है, इसे खुजली हो गई है. नहीं दीदी, नहीं, मैं इस की सेवा करूंगी, इस के जख्म धोऊंगी क्योंकि यह मेरे लिए साधारण कुत्ता नहीं है, यह बिल्लू है, मेरे पति का जान से भी प्यारा बिल्लू. और जो चीज मेरे पति को प्यारी है, वह मुझे भी प्यारी है, चाहे वह बीमार कुत्ता ही क्यों न हो.’’
सीमा ठगी सी खड़ी रह गई. आंसुओं के सागर में डूबी यह भोंदू क्या कह रही है. उसे लगा जैसे लीला के शब्द उस के कानों के परदों पर हथौड़ों की तरह पड़ रहे हों और उस का बिल्लू भौंभौं कर के उसे अपने घर से भगा देना चाहता हो.
अकस्मात ही उस की रुलाई फूट पड़ी और उस ने लीला का आंसुओंभरा चेहरा अपने दोनों हाथों में भर लिया, ‘‘मत रो, मेरी लीला, आज तुम ने मेरी आंखों के जाले साफ कर दिए हैं. आज मैं समझ गई कि तुम्हारा पति तुम से इतना प्यार क्यों करता है. तुम उस जानवर को भी प्यार करती हो जो तुम्हारे पति को प्यारा है. और मैं, मैं उन इंसानों से प्यार करने की भी कीमत मांगती हूं, जो अटूट बंधनों से मेरे पति के मन के साथ बंधे हैं. तुम्हारे घर का जर्राजर्रा तुम्हारे प्यार का दीवाना है और मेरे घर की एकएक ईंट मुझे अजनबी समझती है. लेकिन अब नहीं, मेरी लीला, अब ऐसा नहीं होगा.’’
लीला ने हैरान हो कर सीमा को देखा. सीमा ने अपने घर की तरफ रुख कर लिया. अपनी गलतियों को सुधारने की प्रबल इच्छा उस की आंखों में दिख रही थी.

तुम को ढूंढ़ा करती हैं - रवि प्रभात

 पुरे आठ पहर नज़रे
तुम को ढूंढ़ा करती हैं

किसी के आहट पे
तुम को ढूंढ़ा करती हैं

एहसास तो पास का होता है
पर नज़रे उदास होती है

तेरे बेरुखी आदतों ने
मुझे उदास कर रखा है

तुम दिख जाओ एक बार
इस चाह में
बार बार पलटा करता हूँ

फिर वही खालीपन
और वही ख़ामोशी
मुझे चिढ़ा जाती है

पुरे आठ पहर नज़रे
तुम को ढूंढ़ा करती है

Tuesday, 1 May 2018

गज़ल - जिसे हालात ने मारा हो मुहब्बत कैसे वो कर ले

जिसे हालात ने मारा हो मुहब्बत कैसे वो कर ले,
जो खुद टूटा सितारा हो मुहब्बत कैसे वो कर ले,
==============================
सहारा देना पड़ता है इक दूजे को मुश्किल में,
जो खुद ही बेसहारा हो मुहब्बत कैसे वो कर ले,
==============================
जीने के लिए छत भी ज़रूरी होती है सर पर,
जो खुद बेघर बेचारा हो मुहब्बत कैसे वो कर ले,
==============================
जीत है लाज़िमी शतरंज की बाज़ी हो या दिल की,
जो खुद दुनिया से हारा हो मुहब्बत कैसे वो कर ले,
==============================
ना कोई राह ना मंज़िल ना जीने का कोई मकसद,
जो खुद बादल आवारा हो मुहब्बत कैसे वो कर ले,
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आभार सहित :- भरत मल्होत्रा।

Monday, 30 April 2018

ठुकराओ अब कि प्यार करो मैं नशे में हूँ - शाहिद कबीर

ठुकराओ अब कि प्यार करो मैं नशे में हूँ

जो चाहो मेरे यार करो मैं नशे में हूँ

अब भी दिला रहा हूँ यक़ीन-ए-वफ़ा मगर

मेरा न ए'तिबार करो मैं नशे में हूँ

अब तुम को इख़्तियार है ऐ अहल-ए-कारवाँ

जो राह इख़्तियार करो मैं नशे में हूँ

गिरने दो तुम मुझे मिरा साग़र संभाल लो

इतना तो मेरे यार करो मैं नशे में हूँ

अपनी जिसे नहीं उसे 'शाहिद' की क्या ख़बर

तुम उस का इंतिज़ार करो मैं नशे में हूँ

Saturday, 28 April 2018

पेड़ के पत्तों में हलचल है ख़बर-दार से हैं - गुलज़ार

पेड़ के पत्तों में हलचल है ख़बर-दार से हैं

शाम से तेज़ हवा चलने के आसार से हैं

नाख़ुदा देख रहा है कि मैं गिर्दाब में हूँ

और जो पुल पे खड़े लोग हैं अख़बार से हैं

चढ़ते सैलाब में साहिल ने तो मुँह ढाँप लिया

लोग पानी का कफ़न लेने को तय्यार से हैं

कल तवारीख़ में दफ़नाए गए थे जो लोग

उन के साए अभी दरवाज़ों पे बेदार से हैं

वक़्त के तीर तो सीने पे सँभाले हम ने

और जो नील पड़े हैं तिरी गुफ़्तार से हैं

रूह से छीले हुए जिस्म जहाँ बिकते हैं

हम को भी बेच दे हम भी उसी बाज़ार से हैं

जब से वो अहल-ए-सियासत में हुए हैं शामिल

कुछ अदू के हैं तो कुछ मेरे तरफ़-दार से हैं

Wednesday, 25 April 2018

कर्ब चेहरों पे सजाते हुए मर जाते हैं - मालिकज़ादा जावेद

कर्ब चेहरों पे सजाते हुए मर जाते हैं

हम वतन छोड़ के जाते हुए मर जाते हैं

ज़िंदगी एक कहानी के सिवा कुछ भी नहीं

लोग किरदार निभाते हुए मर जाते हैं

उम्र-भर जिन को मयस्सर नहीं होती मंज़िल

ख़ाक राहों में उड़ाते हुए मर जाते हैं

कुछ परिंदे हैं जो सूखे हुए दरियाओं से

इल्म की प्यास बुझाते हुए मर जाते हैं

ज़िंदा रहते हैं कई लोग मुसाफ़िर की तरह

जो सफ़र में कहीं जाते हुए मर जाते हैं

उन का पैग़ाम मिला करता है ग़ैरों से मुझे

वो मिरे पास ख़ुद आते हुए मर जाते हैं

जिन को अपनों से तवज्जोह नहीं मिलती 'जावेद'

हाथ ग़ैरों से मिलाते हुए मर जाते हैं

Tuesday, 24 April 2018

तन्हा दिल की दीवारों पर - अंजु गुप्ता

 तन्हा दिल की दीवारों पर
कुछ परछाइयां मंडराती हैं !
कभी छेड़ें दिल के तारों को,
कभी एकाँकी कर जाती हैं ! !

कभी पंख लगा के हसरतें,
अल्हड़पन में पहुंच जाती हैं !
खुशियों भरी प्यारी राहें,
फिर वापिस मुझे बुलाती हैं ! !

कुछ अनुत्तरित बातें जीवन की
अस्तित्व मेरी झुठलाती हैं !
आँखों की नमी ओढ़ मुस्कुराहट,
फिर बेचैनी मेरी छुपातीं हैं ! !

क्यों दिल की दीवारों पर
कुछ परछाइयां मंडराती हैं !
क्यों छेड़ें दिल के तारों को,
क्यों एकाँकी कर जाती हैं ! !

अंजु गुप्ता

दिल में नफरत थी मुहब्बत ही सजा ली हमने - कुमार अरविन्द

 रोग जाता ही नहीं कितनी दवा ली हमने
माँ के क़दमों में झुके और दुआ ली हमने
इस ज़माने ने सताया भी बहुत है मुझको
आग ये सीने की अश्कों से बुझा ली हमने
जब नजर आई नहीं ख्वाब में माँ की सूरत
अपनी आंखों से हर इक नींद हटा ली हमनें
देखने तो आज सभी आये तमाशा मेरा
जब से दीवार घरों में ही उठा ली हमने
तेरी चाहत में हुआ है हाल दिवानों जैसा
अपनी पगड़ी ही सरे आम उछाली हमनें
हर तरफ ही यूं नजर आने लगी उल्फ़त जब
दिल में नफरत थी मुहब्बत ही सजा ली हमने
खत्म हो जाये न ये दौर मुलाकातों का
ज़िंदगी बस तेरे वादे पे बिता दी हमने
माँ के क़दमों में ये सारा ही जहां दिखता है
बस तेरी याद में हस्ती भी मिटा ली हमने
खौफ था मुझको चरागों से ही घर जलने का
आग ‘अरविन्द’ घरों में ही लगा ली हमने

— कुमार अरविन्द

बातें ही बातें हैं...भगवती प्रसाद व्यास 'नीरद'

चाहत मेरी पहचानता नहीं ,
दिल की बातें वह जानता नहीं !!

फूलों की माला है चुनी बुनी ,
बांध चुके गांठें मानता नहीं !!

आंखों में नींदों की खता कहां ,
आस चढ़ी सूली जानता नहीं !!

अलकें हैं काली सी घटा यहां ,
भीगें हम दोनों मानता नही !!

बातें ही बातें हैं अदा कभी ,
सब कुछ पायेगा मानता नहीं !!

अपनों ने अकसर दी सज़ा यहां ,
गैरों के दिल की जानता नहीं !!

खुशबू को बांधा है यदा कदा ,
वक़्त ठहर जाये ठानता नहीं !!

हमने तो बुन डाले सपन कई ,
पल ने जो ठानी मानता नहीं !!

दुनिया में मतवाला दिखे वही ,
सूरत दूजी पहचानता नहीं !!

Monday, 23 April 2018

हिज्र के काँच चुभे है हाथ की लकीरों में...सुरिंदर कौर


हिज्र के काँच चुभे है हाथ की लकीरों में।
इशक ने बैठा दिया ला कर हमे फकीरों में

ख़ता तो इतनी बड़ी नही, मेरी सैय्याद मेरे।
जकड़ के क्यू रखा है फिर मुझे जंजीरों मे।

ढूँढने से तो सुना है ,खुदा भी मिल जाता है,
लेकिन क्या पता,क्या लिखा है तकदीरों मे।

मेरी हस्ती पे ,गर तेरा करम बना रहे मालिक,
निकाल लूँगी मै राह ,लड़ कर तदबीरों से।

जीना है, तो जिंदगी में करम कर तू ऐ बंदे,
वक्त न ज़ाया कर ,सुनने को तहरीरों में।

सुरिंदर कौर
 

Sunday, 22 April 2018

ये एक बात समझने में रात हो गई है - तहज़ीब हाफ़ी

ये एक बात समझने में रात हो गई है

मैं उस से जीत गया हूँ कि मात हो गई है

मैं अब के साल परिंदों का दिन मनाऊँगा

मिरी क़रीब के जंगल से बात हो गई है

बिछड़ के तुझ से न ख़ुश रह सकूँगा सोचा था

तिरी जुदाई ही वज्ह-ए-नशात हो गई है

बदन में एक तरफ़ दिन तुलूअ' मैं ने किया

बदन के दूसरे हिस्से में रात हो गई है

मैं जंगलों की तरफ़ चल पड़ा हूँ छोड़ के घर

ये क्या कि घर की उदासी भी साथ हो गई है

रहेगा याद मदीने से वापसी का सफ़र

मैं नज़्म लिखने लगा था कि ना'त हो गई है

न ख़ौफ़-ए-बर्क़ न ख़ौफ़-ए-शरर लगे है मुझे - मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद

न ख़ौफ़-ए-बर्क़ न ख़ौफ़-ए-शरर लगे है मुझे

ख़ुद अपने बाग़ को फूलों से डर लगे है मुझे

अजीब दर्द का रिश्ता है सारी दुनिया में

कहीं हो जलता मकाँ अपना घर लगे है मुझे

मैं एक जाम हूँ किस किस के होंट तक पहुँचूँ

ग़ज़ब की प्यास लिए हर बशर लगे है मुझे

तराश लेता हूँ उस से भी आईने 'मंज़ूर'

किसी के हाथ का पत्थर अगर लगे है मुझे

Thursday, 19 April 2018

स्मृतियों ने साथ न छोड़ा – आलोक यादव


स्मृतियों ने साथ न छोड़ा

मनबसियों ने साथ न छोड़ा

धुंधले हुए चित्र बचपन के

कौन सुनाए परीकथाएं

ऐसी नींद नहीं आती अब

जिन में फिर वो सपने आएं

पर सपनों में जो आती थीं

उन परियों ने साथ न छोड़ा

जीवन की आपाधापी में

जाने कितने साथी छूटे

जग में मनभावन उपवन के

छूटे कितने ही गुलबूटे

जिन की गंध बसी थी मन में

उन कलियों ने साथ न छोड़ा

यायावर हम निपट अकेले

रह पाए किस घर के हो के

चौखट ऐसी कोई नहीं थी

कर मनुहार हमें जो रोके

पर हम साथ जहां चलते थे

उन गलियों ने साथ न छोड़ा.

– आलोक यादव

खुशबुओं का कहाँ ठिकाना है - नीरज निश्चल

 हर तरफ फैलते ही जाना है ।
खुशबुओं का कहाँ ठिकाना है ।

हमसफ़र आप सा मिले जिसको,
उसका तो हर सफर सुहाना है ।

हमने पूछा कि ज़िन्दगी क्या है,
उसने बोला कि मुस्कराना है ।

आपको हर खुशी मुबारक हो,
हर दुआ का यही तराना है ।

किस्सा ए ज़िन्दगी अगर समझो,
कुछ हकीकत है कुछ फ़साना है ।

देख कर जिसको जान जाती है,
ज़िन्दगी का वही बहाना है ।

नीरज निश्चल

सोचा करता हूँ - नीरज निश्चल 

सोचा करता हूँ मै तेरा ओहदा  रब से कम क्या होगा ।
हिज़्र में जब है इतनी लज्जत वस्ल का आलम क्या होगा ।

इश्क के पहलू में तो खिजां भी नूर खिलाती है दिल में,
ये मेरा भगवान ही जाने फूलों का मौसम क्या होगा ।

माना तेरी खबर नहीं कुछ लेकिन मै बेखबर नहीं,
अपना हाल बता देता है हाले हमदम क्या होगा ।

रहकर मुझसे दूर तू साथी मेरे कितने पास भी है,
इस दुनिया मे कोई तुझसा मेरा महरम क्या होगा ।

‘नीरज’ जिसकी राहों में ये लुत्फे जीवन पाया है,
तड़प उठा हूँ सोच के उस मंजिल का संगम क्या होगा ।

नीरज निश्चल

Wednesday, 18 April 2018

कविता – दे कोई दुहाई - जयति जैन 'नूतन'

 नयनों की पुकार है

उस आंख वाले को

जो नासमझ बना है

जो निशब्द आगे बढ़ा है।

नजर ना आया जिसे

नयनों का गर्म नीर

नजरअंदाज किया जिसने

चोट खाती हुई पीर।

वेदना के क्षण भूला

आंखों का सपना टूटा

ढलती शाम सा जीवन में

अंधेरों में एक पुष्प खिला।

दे कोई उसे दुहाई

कोई तो एहसास जगे

पायल की झनकार सुने वो

जीवन में श्रृंगार भरे।