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Friday, 18 May 2018

तुम को ढूंढ़ा करती हैं - रवि प्रभात

 पुरे आठ पहर नज़रे
तुम को ढूंढ़ा करती हैं

किसी के आहट पे
तुम को ढूंढ़ा करती हैं

एहसास तो पास का होता है
पर नज़रे उदास होती है

तेरे बेरुखी आदतों ने
मुझे उदास कर रखा है

तुम दिख जाओ एक बार
इस चाह में
बार बार पलटा करता हूँ

फिर वही खालीपन
और वही ख़ामोशी
मुझे चिढ़ा जाती है

पुरे आठ पहर नज़रे
तुम को ढूंढ़ा करती है

Tuesday, 1 May 2018

गज़ल - जिसे हालात ने मारा हो मुहब्बत कैसे वो कर ले

जिसे हालात ने मारा हो मुहब्बत कैसे वो कर ले,
जो खुद टूटा सितारा हो मुहब्बत कैसे वो कर ले,
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सहारा देना पड़ता है इक दूजे को मुश्किल में,
जो खुद ही बेसहारा हो मुहब्बत कैसे वो कर ले,
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जीने के लिए छत भी ज़रूरी होती है सर पर,
जो खुद बेघर बेचारा हो मुहब्बत कैसे वो कर ले,
==============================
जीत है लाज़िमी शतरंज की बाज़ी हो या दिल की,
जो खुद दुनिया से हारा हो मुहब्बत कैसे वो कर ले,
==============================
ना कोई राह ना मंज़िल ना जीने का कोई मकसद,
जो खुद बादल आवारा हो मुहब्बत कैसे वो कर ले,
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आभार सहित :- भरत मल्होत्रा।

Monday, 30 April 2018

ठुकराओ अब कि प्यार करो मैं नशे में हूँ - शाहिद कबीर

ठुकराओ अब कि प्यार करो मैं नशे में हूँ

जो चाहो मेरे यार करो मैं नशे में हूँ

अब भी दिला रहा हूँ यक़ीन-ए-वफ़ा मगर

मेरा न ए'तिबार करो मैं नशे में हूँ

अब तुम को इख़्तियार है ऐ अहल-ए-कारवाँ

जो राह इख़्तियार करो मैं नशे में हूँ

गिरने दो तुम मुझे मिरा साग़र संभाल लो

इतना तो मेरे यार करो मैं नशे में हूँ

अपनी जिसे नहीं उसे 'शाहिद' की क्या ख़बर

तुम उस का इंतिज़ार करो मैं नशे में हूँ

Wednesday, 25 April 2018

कर्ब चेहरों पे सजाते हुए मर जाते हैं - मालिकज़ादा जावेद

कर्ब चेहरों पे सजाते हुए मर जाते हैं

हम वतन छोड़ के जाते हुए मर जाते हैं

ज़िंदगी एक कहानी के सिवा कुछ भी नहीं

लोग किरदार निभाते हुए मर जाते हैं

उम्र-भर जिन को मयस्सर नहीं होती मंज़िल

ख़ाक राहों में उड़ाते हुए मर जाते हैं

कुछ परिंदे हैं जो सूखे हुए दरियाओं से

इल्म की प्यास बुझाते हुए मर जाते हैं

ज़िंदा रहते हैं कई लोग मुसाफ़िर की तरह

जो सफ़र में कहीं जाते हुए मर जाते हैं

उन का पैग़ाम मिला करता है ग़ैरों से मुझे

वो मिरे पास ख़ुद आते हुए मर जाते हैं

जिन को अपनों से तवज्जोह नहीं मिलती 'जावेद'

हाथ ग़ैरों से मिलाते हुए मर जाते हैं

Tuesday, 24 April 2018

तन्हा दिल की दीवारों पर - अंजु गुप्ता

 तन्हा दिल की दीवारों पर
कुछ परछाइयां मंडराती हैं !
कभी छेड़ें दिल के तारों को,
कभी एकाँकी कर जाती हैं ! !

कभी पंख लगा के हसरतें,
अल्हड़पन में पहुंच जाती हैं !
खुशियों भरी प्यारी राहें,
फिर वापिस मुझे बुलाती हैं ! !

कुछ अनुत्तरित बातें जीवन की
अस्तित्व मेरी झुठलाती हैं !
आँखों की नमी ओढ़ मुस्कुराहट,
फिर बेचैनी मेरी छुपातीं हैं ! !

क्यों दिल की दीवारों पर
कुछ परछाइयां मंडराती हैं !
क्यों छेड़ें दिल के तारों को,
क्यों एकाँकी कर जाती हैं ! !

अंजु गुप्ता

Sunday, 22 April 2018

ये एक बात समझने में रात हो गई है - तहज़ीब हाफ़ी

ये एक बात समझने में रात हो गई है

मैं उस से जीत गया हूँ कि मात हो गई है

मैं अब के साल परिंदों का दिन मनाऊँगा

मिरी क़रीब के जंगल से बात हो गई है

बिछड़ के तुझ से न ख़ुश रह सकूँगा सोचा था

तिरी जुदाई ही वज्ह-ए-नशात हो गई है

बदन में एक तरफ़ दिन तुलूअ' मैं ने किया

बदन के दूसरे हिस्से में रात हो गई है

मैं जंगलों की तरफ़ चल पड़ा हूँ छोड़ के घर

ये क्या कि घर की उदासी भी साथ हो गई है

रहेगा याद मदीने से वापसी का सफ़र

मैं नज़्म लिखने लगा था कि ना'त हो गई है

Thursday, 19 April 2018

रोज़ इक शख़्स चला जाता है ख़्वाहिश करता - राज़ी अख्तर शौक़

रोज़ इक शख़्स चला जाता है ख़्वाहिश करता

अभी आ जाएगा बादल कोई बारिश करता

घर से निकला तो जहाँ-ज़ाद ख़ुदा इतने थे

मैं अना-ज़ाद भी किस किस की परस्तिश करता

हम तो हर लफ़्ज़ में जानाँ तिरी तस्वीर हुए

इस तरह कौन सा आईना सताइश करता

किसी वहशत-ज़दा आसेब की मानिंद हूँ मैं

इक मकाँ में कई नामों से रिहाइश करता

इक न इक दिन तो ये दीवार-ए-क़फ़स गिरनी थी

मैं न करता तो कोई और ये शोरिश करता

अब जो तस्वीर बना ली तो ये धुन और लगी!

कभी देखूँ लब-ए-तस्वीर को जुम्बिश करता

सब अंधेरे में हैं इक अपने मकाँ की ख़ातिर

क्या हवाओं से चराग़ों की सिफ़ारिश करता

और क्या मुझ से तिरी कूज़ा-गरी चाहती है

मैं यहाँ तक तो चला आया हूँ गर्दिश करता

इन ज़मीनों ही पे क्या ख़ोशा-ए-गंदुम के लिए

आसमानों से चला आया हूँ साज़िश करता

             - राज़ी अख्तर शौक़

स्मृतियों ने साथ न छोड़ा – आलोक यादव


स्मृतियों ने साथ न छोड़ा

मनबसियों ने साथ न छोड़ा

धुंधले हुए चित्र बचपन के

कौन सुनाए परीकथाएं

ऐसी नींद नहीं आती अब

जिन में फिर वो सपने आएं

पर सपनों में जो आती थीं

उन परियों ने साथ न छोड़ा

जीवन की आपाधापी में

जाने कितने साथी छूटे

जग में मनभावन उपवन के

छूटे कितने ही गुलबूटे

जिन की गंध बसी थी मन में

उन कलियों ने साथ न छोड़ा

यायावर हम निपट अकेले

रह पाए किस घर के हो के

चौखट ऐसी कोई नहीं थी

कर मनुहार हमें जो रोके

पर हम साथ जहां चलते थे

उन गलियों ने साथ न छोड़ा.

– आलोक यादव

सोचा करता हूँ - नीरज निश्चल 

सोचा करता हूँ मै तेरा ओहदा  रब से कम क्या होगा ।
हिज़्र में जब है इतनी लज्जत वस्ल का आलम क्या होगा ।

इश्क के पहलू में तो खिजां भी नूर खिलाती है दिल में,
ये मेरा भगवान ही जाने फूलों का मौसम क्या होगा ।

माना तेरी खबर नहीं कुछ लेकिन मै बेखबर नहीं,
अपना हाल बता देता है हाले हमदम क्या होगा ।

रहकर मुझसे दूर तू साथी मेरे कितने पास भी है,
इस दुनिया मे कोई तुझसा मेरा महरम क्या होगा ।

‘नीरज’ जिसकी राहों में ये लुत्फे जीवन पाया है,
तड़प उठा हूँ सोच के उस मंजिल का संगम क्या होगा ।

नीरज निश्चल

Wednesday, 18 April 2018

कविता – दे कोई दुहाई - जयति जैन 'नूतन'

 नयनों की पुकार है

उस आंख वाले को

जो नासमझ बना है

जो निशब्द आगे बढ़ा है।

नजर ना आया जिसे

नयनों का गर्म नीर

नजरअंदाज किया जिसने

चोट खाती हुई पीर।

वेदना के क्षण भूला

आंखों का सपना टूटा

ढलती शाम सा जीवन में

अंधेरों में एक पुष्प खिला।

दे कोई उसे दुहाई

कोई तो एहसास जगे

पायल की झनकार सुने वो

जीवन में श्रृंगार भरे।

Friday, 13 April 2018

तुम्ही तुम

‌‌‍तुम्ही तुम क्यो नजर आते हो
हर पल हर क्षण क्यो सताते हो
ख्वाबो मे तुम दिखते हो
हकिकत में भी सामने आ जाते हो
हर मुश्किल काम आसान बनाते हो
और आसान को भी मुश्किल कर देते हो
कभी बच्चो की तरह रोते हो तो
कभी बड़े बन समझाते हो
खुद रूठते हो खुद मान जाते हो
मुझे मनाने का अवसर ही कहां देते हो
कभी शिकायतें हजार करते हो
कभी तारीफो की पुल बॉध देते हो
शुरूआत तुम्ही करते हो
अंत भी जल्द कर देते हो
मुझे तो बीच मे ही अकेला छोड़ देते हो
कभी चॉद देखने की बात करते हो
कभी मुझमे ही चॉद देखते हो
क्या कहूँ तुझे मैं
तुम्हारी हर अदा निराली है
बस ज्यादा नखरे ना दिखाना
क्योकि अब हमारी बारी हैं।

निवेदिता चतुर्वेदी’निव्या’

गजल - तमन्ना उसकी की है जो कभी हांसिल नहीँ होगा


तमन्ना उसकी की है जो कभी हांसिल नहीँ होगा
कभी कश्ती की बाहों में कोई साहिल नहीं होगा।

जला दूं तुम कहो तो दिल की हर ख्वाहिशें अपनी
मगर फिर भी हमारा दिल तेरे क़ाबिल नहीं होगा।

बहुत समझा लिया है हमने अपने दिलको हमदम
तेरी दुनिया में दोबारा ये दिल शामिल नहीं होगा।

भरोसा कर लिया मैंने लगाया इल्ज़ाम जो तुमने
सफ़ाई दें भी क्या अपनी गवाह हाज़िर नहीँ होगा।

अब चलो हम हार जाते हैं जब हमको हारना ही है
दिल्लगी के खेल में तुमसे बड़ा माहिर नहीं होगा।

हां बड़े अहसान हैं हमपर खुदाया शुक्रिया है तेरा
दर्द ए उल्फत में भी जानिब दिल काफिर नहीँ होगा।

— पावनी

Monday, 2 April 2018

गजल - नवीन मणि त्रिपाठी

‘इस चमन में शजर चन्द  ऐसे रहे ।
जो सदा ज़ुल्म तूफ़ाँ का सहते रहे।।

घर हमारा रकीबों ने लूटा बहुत ।
और वे आईने में सँवरते रहे ।।

था तबस्सुम का अंदाज ही इस तरह ।
लोग कूंचे से उनके निकलते रहे ।।

देखकर जुल्फ को होश क्यों खो दिया ।
आपके तो इरादे बहकते रहे ।।

दिल लगाने से पहले तेरे हुस्न को ।
जागकर रात भर हम भी पढ़ते रहे ।।

यह मुहब्बत नहीं और क्या थी सनम ।
लफ्ज़ खामोश थे बात करते रहे ।।

कैसे कह दूं कि मुझसे जुदा आप हैं ।
ख्वाब में आप तो रोज़ मिलते रहे ।।

कुछ तो साजिश मुहब्बत में थी आपकी ।
बेसबब आप क्यूँ मुझको छलते रहे ।।

खुदकुशी कर लूं हम ये है मुमकिन कहाँ ।
जिंदगी के लिए हम  तरसते रहे ।।

मैं सजा लेता पलकों में तुमको मगर ।
इश्क में तुम भी चेहरे बदलते रहे ।।

कुछ शरारत लिए थीं वो अंगड़ाइयां ।
देखकर उम्र भर  हम  मचलते रहे ।।

कर गयी जो असर आपकी वह नजर ।
आज तक बेखुदी में टहलते रहे ।।

दो बदन जल उठे आग ऐसी लगी ।
मुद्दतों बाद हम भी सुलगते रहे ।।

–नवीन मणि त्रिपाठी

एक शाम मुझे तुम मिल जाओ

एक शाम मुझे तुम मिल जाओ
कुछ बातेँ तुमसे करनी हैँ,
उजली-धुँधली तस्वीरों की
कुछ यादें ताजा करनी हैँ.........१
वो बाग-बग़ीचों में मिलना
खेतों-खलिहानों में मिलना,
वो आमों के बागों वाली
पगडंडी फिर से चलनी है,
एक शाम मुझे तुम मिल जाओ
कुछ बातेँ तुमसे करनी हैँ............२
वो छुप-छुप कर तुमसे मिलना
क्यारी में फूलों का खिलना,
वो महुआ की महकती डाली
आज फ़िर से पकड़नी है,
एक शाम मुझे तुम मिल जाओ
कुछ बातें तुमसे करनी हैँ...........३
वो नदिया के गीले तट पर
साँझ ढले का अँधियारा,
वो सरसों के खेतों की मेड़ो वाली
तँग राह फिर से गुजरनी है,
एक शाम मुझे तुम मिल जाओ
कुछ बातें तुमसे करनी हैँ.............४
वो नीम के फूलों का गुच्छा
गेंहू की भुनी हुयी बाली,
वो गाँव के कुयें में पानी वाली
तेरी मटकी फिर से पकड़नी है,
एक शाम मुझे तुम मिल जाओ
कुछ बातेँ तुमसे करनी हैँ.............५
वो गाँव की हाट का कच्चा रास्ता
सावन में मेलों के झूले,
तीखे-तीखे चाट-पकौड़े
वो मिर्ची फिर से चखनी है,
एक शाम मुझे तुम मिल जाओ
कुछ बातेँ तुमसे करनी हैं..........६
वो मन्दिर के पिछवारे में
खण्डहर की टूटी दीवारें,
मख़मल के घास बिछौने पे
ढलते सूरज की अगुवाई फिर से करनी है,
एक शाम मुझे तुम मिल जाओ
कुछ बातें तुमसे करनी हैँ..............७
वो नहर का छोटा सा पुल
पानी पे सूरज की किरणें,
मेरी रफ़ कॉपी से बनी
कागज़ की नाव चलानी है,
एक शाम मुझे तुम मिल जाओ
कुछ बातेँ तुमसे करनी हैँ.............८
वो इमली के पेड़ों की खटास
अमरूद के मौसम की मिठास,
वो बेरों के काँटो की चुभन
मुझे गालों पे फिर से सहनी हैँ,
एक शाम मुझे तुम मिल जाओ
कुछ बातेँ तुमसे करनी हैँ..............९
वो चिड़ियों सँग आवारा पन
बादल का बंजारा पन,
वो हवा में उड़ती लाल पतंग
तेरे लिये पकड़ कर लानी है,
एक शाम मुझे तुम मिल जाओ
कुछ बातेँ तुमसे करनी हैँ..........१०
तूने अपनी नादानी में
जो चीजें मुझस छीनी हैँ,
जब साथ था अपना हरदम का
वो ज़िन्दगी फिर से जीनी है,
एक शाम मुझे तुम मिल जाओ
कुछ बातेँ तुमसे करनी हैँ...........११

Wednesday, 28 March 2018

जाम नजरों के - Quote by Ravindra Gangwar

थोड़ा और करीब आओ ना, इश्क करने को जी चाहता है !
तुम जाम अपनी नजरों से पिलाना, मैं थोड़ा और बहक जाऊं !!

खामोशियां - Quote by Ravindra Gangwar

बर्बाद रातों के सिवा, अब कुछ नहीं पास मेरे !
बस खामोशियां हैं, और कुछ सिसकियां !!

Tuesday, 27 March 2018

Monday, 26 March 2018

हम मुसाफ़िर यूं ही मसरूफ़े सफ़र जाएंगे

हम मुसाफ़िर यूं ही मसरूफ़े सफ़र जाएंगे
बेनिशां हो गए जब शहर तो घर जाएंगे

किस क़दर होगा यहां मेहर-ओ-वफ़ा का मातम
हम तेरी याद से जिस रोज़ उतर जाएंगे

जौहरी बंद किए जाते हैं बाज़ारे-सुख़न
हम किसे बेचने अलमास-ओ-गुहर जाएंगे

नेमते-ज़ीस्त का ये करज़ चुकेगा कैसे
लाख घबरा के ये कहते रहें मर जाएंगे

शायद अपना ही कोई बैत हुदी-ख़्वां बनकर
साथ जाएगा मेरे यार जिधर जाएंगे

‘फ़ैज़’ आते हैं रहे, इश्क़ में जो सख़्त मक़ाम
आने वालों से कहो हम तो गुज़र जाएंगे

       ©®फैज अहमद फैज

Sunday, 19 November 2017

*जुदाई का एक ख़त*

*जुदाई का एक ख़त*

जानां!

जानती हो ,
रोज़ सोचता हूँ एक ख़त लिखूँ तुमको, वही ख़त जो मैंने अपने इश्क़ के पहले दिन से लिखना चाहा था। लेकिन कभी लिख नहीं पाया लेकिन सोच रहा हूँ आज लिखूँ, फिर अगले ही पल सोचता हूँ कि क्या वो खत कभी पहुँचा पाऊंगा तुमको और अगर कभी तुमको मिल भी गया तो क्या तुम पढ़ोगी उसको?
क्या तुम पढ़ पाओगी या यूँ कहूँ कि महसूस कर पाओगी उनको क्योंकि शब्दों को पढ़ा नही महसूस किया जाता है। क्या तुम महसूस कर पाओगी कि कितना अकेला हो गया हूँ मैं?

अगर मेरी इस लाइन को तुमने महसूस किया होगा तो मुझे शायद ये बताना नहीं पड़ेगा कि  कितना ज़्यादा अकेला हो गया हूँ मैं। कैसे बताऊँ कि कभी-कभी बहुत कुछ लिखना चाहता हूँ लेकिन पन्ने फटते हैं, कलम चलती है और कोई भी कहानी या कविता पूरी नहीं हो पाती क्योंकि शब्द तो खो गए हैं ना मेरे।

तुम जो खो गयी हो ना, जानती हो दिन बहुत उदास रहने लगे है मेरे और रात मुझे घूरती है हर रोज़ बुझने तक। बालकनी मेरी सबसे पसंदीदा जगह हो गयी है, कभी-कभी तो पूरी रात वहाँ बीत जाती है। हाँ, सच मे पूरी रात!

कभी कभी तो लैम्पपोस्ट के इन लाइटों से भी चिढ़ होती है, जी करता है कि फोड़ दूँ इनको। कभी मन करता है रोड पर चल रहे या आसपास रह रहे हर किसी से बात करूं और कभी सोचता हूँ कि इतना शांत हो जाऊं कि किसी की आवाज़ ही ना सुनाई दे, और सुनूँ तुम्हारी साथ की गयी हर बात को।

मुझे अपने आस पास की हर चीज़ महसूस होती है। नल से टिप-टिप रिसता पानी, घड़ी की टिक-टिक करती आवाज़, पंखे का शोर, अगर कुुछ नहींं सुनाई देती हैै तो तुम्हारे लौट आने की उम्मीद।

जानाँ, मैंने सच में सिर्फ तुमसे प्यार किया था सिर्फ तुमसे। तुम्हारे साथ बिताया हुआ हर एक पल एक फ़िल्म की तरह चलता रहता है आंखों के सामने, हाँ वही दो या तीन महीने ही जो तुमको बहुत कम समय लगा था और मुझे बहुत बड़ा क्योंकि उन दिनों को नहीं, मैंने तो पलों को जिया था ना। उन पलों को जिनमें तुम पास थी, साथ थी।

और भी बहुत कुछ है लिखने को जो मेरे शब्द समेट नहीं पा रहे, और कलम लिख नहीं पा रही, सो बस।

हाँ कभी कभी रो भी लेता हूँ, लड़के भी रोते हैं।
आज अकेलापन सारी सीमाएं पार कर रहा है।

सुनो ना! अगर हो सके तो लौट आओ मैं ये तो नहीं कहूंगा कि मैं दुनिया मे सबसे ज़्यादा प्यार दूंगा तुमको, लेकिन ये वादा है तुमसे कि मेरी दुनिया के सारे प्यार पर सिर्फ तुम्हारा हक़ होगा।

लौट आओ ना प्लीज़।

तुम्हारे खत के इंतज़ार में...