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Friday, 18 May 2018

'दिन-रात खटते हैं फिर लोग पूछते हैं काम क्या करती हो

क्या आप ऐसी नौकरी करना पसंद करेंगे जिसमें रोज 16-17 घंटे काम करना हो, हफ़्ते में किसी दिन छुट्टी न मिले, कोई सैलरी न मिले और इन सबके बाद कहा जाए कि तुम काम क्या करते हो? दिन भर सोते तो रहते हो!

असल में देश का एक बड़ा तबका ऐसी ही नौकरी कर रहा है. ये नौकरी करने वाली औरतें हैं. वो औरतें जिन्हें हम हाउसवाइफ़, होममेकर या गृहणी कहते हैं.

गृहणियों के काम को लेकर एक बार फिर चर्चा छिड़ी जब कुछ दिनों पहले कर्नाटक हाइकोर्ट ने एक मामले में अपना फ़ैसला सुनाया.

हुआ ये था कि एक दंपती के बीच तलाक़ का मामला चल रहा था और पत्नी को अदालत में पेश होने के लिए मुज़फ़्फ़रनगर से बेंगलुरु आना था.

वो फ़्लाइट से आना चाहती थी लेकिन पति चाहता था कि वो ट्रेन से आए क्योंकि वो हाउसवाइफ़ है और उसके पास 'बहुत खाली वक़्त' है.

'सातों दिन एक जैसे'

हालांकि जस्टिस राघवेंद्र एस चौहान पति की दलील से सहमत नहीं हुए और उन्होंने कहा कि एक हाउसवाइफ़ भी उतनी ही व्यस्त होती है जितना बाहर जाकर नौकरी करने वाला कोई शख़्स.

ये सारा मामला सुनकर दिल्ली में रहने वाली काजल पूछती हैं, "अगर कोई मर्द ऑफ़िस से आता है तो हम उसके लिए चाय-पानी लेकर तैयार रहते हैं लेकिन हम दिन भर काम करते हैं तो हमारे लिए कोई ऐसे नहीं करता. क्यों?"

तीन साल की बच्ची को गोद में लिए बैठी नेहा कहती हैं, "घर में सबसे पहले सोकर हम औरतें उठती हैं, सबसे देर में बिस्तर पर भी हम ही जाते हैं और फिर सुनने को मिलता है कि हमारे पास काम क्या है!"

चार बच्चों की मां सुनीता जब अपने काम गिनाना शुरू करती हैं तो ये लिस्ट जैसे ख़त्म होने का नाम नहीं लेती.

गुलाबी लिबास पहने श्वेता फीकी हंसी हंसते हुए कहती हैं, "ऑफ़िस में काम करने वालों को तो हफ़्ते में एक-दो दिन छुट्टी भी मिल जाती है. हमारा तो मंडे टू संडे, सातों दिन एक से होते हैं."

क्या कहते हैं पुरुष?

दिल्ली में एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने वाले सागर मानते हैं कि काम तो किसी के पास कम नहीं है. घर के काम की अपनी चुनौतियां हैं और बाहर के काम की अपनी.

वो कहते हैं ''ये कहना ग़लत होगा कि घर पर औरतों के पास काम नहीं होता. हमें तो छुट्टी मिल भी जाती है लेकिन उनको तो हमेशा मुस्तैद रहना पड़ता है. कभी बड़ों की ज़िम्मेदारी...कभी बच्चों की और पति तो है ही. आदमी तो अपनी ज़िम्मेदारी औरत पर डाल देता है लेकिन औरत किसी से नहीं कह पाती. बहुत मुश्किल है हाउसवाइफ़ होना.''

दिल्ली के ही चंदन का मानना है कि घर संभालना बहुत मुश्किल काम है. वो कहते हैं ''ऐसी औरतें काम पर भले न जाती हों लेकिन उनके बिना आप भी काम पर नहीं जा पाएंगे. नाश्ता तो वही देती हैं...फिर साफ-सुथरे, प्रेस किए कपड़े मिल जाते हैं. ये सब हाथों-हाथ नहीं मिले तो दुनिया के आधे मर्द नौकरी पर ही न जा पाएं. जाएं तो रोज़ लेट ही पहुंचे.''

ज़मीनी सच्चाई

अभी कुछ वक़्त पहले मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता में भारत की मानुषी छिल्लर से पूछा गया था कि दुनिया के किस प्रोफ़ेशन को सबसे ज़्यादा सैलरी मिलनी चाहिए थी.

उन्होंने जवाब दिया था- मां को. कहने की ज़रूरत नहीं है भारत में मांओं की एक बड़ी संख्या गृहणी का काम करती है. यानी वो काम जिसे शायद काम की तरह देखा भी नहीं जाता.

मानुषी के इस जवाब की ख़ूब चर्चा हुई थी और इसके बाद उन्होंने प्रतियोगिता जीतकर विश्वसुंदरी का ताज अपने सिर पर पहना.

घर संभालने वाले महिलाओं की बातें सुनकर ऐसा लगता है कि मानुषी का जवाब ज़मीनी हक़ीकत के काफी क़रीब था.

रिसर्च

ऑर्गनाइज़ेशन फ़ॉर इकोनॉमिक को-ऑपरेशन ऐंड डेवलपमेंट की एक रिसर्च में भारत, चीन और दक्षिण अफ़्रीका जैसे 26 देशों का अध्ययन किया गया.

रिसर्च में पाया गया कि इन देशों की महिलाएँ रोज औसतन साढ़े चार घंटे बिना किसी पैसे के काम करती हैं.

55 साल की सुशीला जब नई-नई दुल्हन बनकर ससुराल आई थीं तो घर में इतना काम होता था कि उन्हें खाने-पीने तक का होश नहीं रहता था.

वो कहती हैं, "सुबह उठकर गोबर थापना, गाय-भैंसों को चारा-पानी देना, घर के बच्चों को स्कूल भेजना, मर्दों को टिफ़िन देना, दोपहर में खाना बनाना और फिर शाम का चाय-नाश्ता बनाकर रात के खाने की तैयारी. पूरे दिन रोटी खाने का टाइम ही नहीं मिलता था. रोटी भी भागते-दौड़ते खाते थे."

'हाउसवाइफ़ क्यों कहते हो'

सुशीला आगे कहती हैं, "इतना खटने के बाद घर का ख़र्च चलाने के लिए पैसे मांगो तो पहले सैकड़ों सवाल पूछे जाते हैं और फिर एक-एक पैसे का हिसाब मांगा जाता है. हम भी नौकरी करते तो अपनी मर्जी से पैसे ख़र्च करते."

मंजू को 'हाउसवाइफ़' शब्द से ही दिक्कत है.

उन्होंने कहा, "ऑफ़िस में काम करने वाले या तो दिन में काम करते हैं या रात में. हम लोग तो सुबह से लेकर रात तक काम करते रहते हैं. फिर हमें हाउसवाइफ़ क्यों कहते हो? हम तो घर की महारानी हुए."

कुछ वक़्त पहले चेतन भगत ने भी इस बात की ओर ध्यान दिलाया था. उन्होंने औरतों से कहा था कि वो ख़ुद को हाउसवाइफ़ कहना बंद करें क्योंकि उनकी शादी घर से नहीं बल्कि एक शख़्स से हुई है.

घरवालों की सबसे बुरी बात क्या लगती है?

"हमें सोने नहीं देते. हम बिस्तर पर ठीक से लेट भी नहीं पाते कि कभी चाय की फ़रमाइश आ जाती है तो कभी किसी के एक पैर का मोजा नहीं मिलता." ये नेहा की शिकायत है.

क्या चाहती हैं ये औरतें

उमा को सबसे ज़्यादा ग़ुस्सा तब आता है जब लोग उन्हें सीरियल देखने के लिए ताना मारते हैं.

वो कहती हैं, "दिन-रात काम करते हैं. थोड़ी देर सीरियल देख भी लिया तो क्या आफ़त आ गई? इसी बहाने हमारा दिल बहल जाता है तो इसमें क्या तकलीफ़ है?"

तो ये औरतें चाहती क्या हैं?

थोड़ी सी तारीफ़, थोड़ी सी इज़्जत और थोड़ा सा प्यार.

उमा, काजल, पूनम, सुनीता और नेहा एक-एक करके जवाब देती हैं.

काजल कहती हैं, "हम जो काम करते हैं वो सैलरी से कहीं ऊपर का है. आप बस इस सच को कबूल लें, इतना ही हमारे लिए काफ़ी होगा.

वैसे अगर मोटा-मोटा अनुमान लगाया जाए तो भी होममेकर्स को कम कम से कम 45-50 हज़ार रुपए महीने मिलने चाहिए.

ब्रिटन में ऑफ़िस फ़ॉर नेशनल स्टैटिस्टिक्स (ONS) की रिपोर्ट (2014) के मुताबिक़ अगर सिर्फ़ घरों में लॉन्ड्री (कपड़े धोने और उनके रखखाव) को गिना जाए तो इसकी क़ीमत 97 अरब से ज़्यादा होगी यानी ब्रिटेन की जीडीपी का 5.9%.

कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि गृहणियों को उनके काम के पैसे भले न मिलते हों लेकिन इन्हें आर्थिक गतिविधियों का हिस्सा माना जाना चाहिए.

Friday, 30 March 2018

शोहर हो तुम उसके कोई खरीदार नहीं

शोहर हो तुम उसके कोई खरीदार नहीं..
तुम्हारे घर का बिस्तर हैं ये कोई रंगरंगेलियों का बाजार नहीं...

कभी तो जरा प्यार से उसकी रजामंदी को  टटोल लो ना..
मत बनाओ उसकी बेबसी को हर रात.. अपने तलब का खिलोना..

क्योंकि बीवी हुई तो क्या हुआ... हैं  तो वो भी इंसान...   दर्द तो उसे भी होता हैं ना.....

हाँ, जानती हूँ तुम यहीं कहोगे कि
उसके जिस्म के हर कतरे पे तुम्हारा हक हैं..
पर उसकी तकलीफों को समझना  ये भी तो तुम्हारा ही फर्ज हैं ना...

और एहतराम का रिश्ता होता हैं ये जनाब.. ना कि एक बार में वसूल कर लेने वाला कोई कर्ज..
तुम उसकी डरी सहमी सी चुपी को मर्जी ना मान लिया करो ना..

क्योंकि बीवी हुई तो क्या हुआ... हैं तो वो भी इंसान.. दर्द तो उसे भी होता हैं  ना....

इतना तो तुम भी जानते हो ना
वो तो अपनी आपबीती भी किसी से कह सकती नहीं ना...
बस अपनी दर्द भरी सिसकियों से सब सह जाती हैं वो
क्योंकि ये मामला ही बहुत अंदरूनी सा हैं ना...

पर सिर्फ जिस्म को रौंदने के लिये होता तो कोई निकाह नहीं ना..
एक बार तो पुछ लो आज उसकी हाँ हैं या ना हैं...
अगर जो हो उसकी ना भी तो.. जरा बालों को सहला कर अपनी बाहों में सुला लो ना...
जरूरी तो नहीं हर रोज बस उसके जिस्म से ही खेलना...
क्योंकि जनाब बीवी हुई तो क्या हुआ हैं तो वो भी इंसान.. दर्द तो उसे भी होता हैं Marriage is not an excuse of rape.. Please respect her feelings nd emotions she is your wife not a slave...  #speakagainstwrong #maritalrape #standagainstrape

Monday, 23 October 2017

*गुलाबी पेन्सिल : भाग-5*

**वो पहली मुलाकात**

ख़ुदा-ख़ुदा करके शाम हुई। घड़ी आज से पहले इतनी स्लो कभी ना थी। सच कहूँ तो आइंस्टीन की 'थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी' आज जाकर समझ आई थी।

मैं 7:45 पर कार उसके घर के पास पार्क करके, उसका इंतज़ार कर रहा था। ज़िन्दगी में पहली बार वक़्त से पहले पहुँचा था। ये मेरी पहली क़ुरबानी थी। अभी तो आगे ना जाने क्या होने वाला था?

ठीक 8 बजे, उसे मैसेज किया।

"ख़ादिम हाज़िर है आपकी ख़िदमत में, मल्लिका-ए-हुस्न को कितना वक़्त लगेगा दीवान-ए-ख़ास से दीवान-ए-आम तक तशरीफ़ लाने में?"

जवाब आया, "बस, 5 मिनट।"

और अगले 50 मिनट तक, हर 5 मिनट बाद मैं यही पूछता रहा कि कितना टाइम, और वो यही जवाब देती रही, "बस, 5 मिनट!"

फिर आख़िरकार मेरा इंतज़ार रंग लाया और उसकी एक ही झलक ने मेरे इंतज़ार के दर्द को हवा कर दिया।

रेड तो नहीं पर ब्लैक ड्रेस पहनी थी उसने। मैंने दिल थाम कर उसे सर से पाँव तलक निहारा।

सरापा नूर, काले लिबास में ऐसा लग रहा था जैसे कोयले की खान से हीरा निकल आया हो।

आँखों में काजल, सिंपल सा मेकअप, जूड़े में लगी पेंसिल और तो और पैरों में भी पेंसिल हील।
ड्रेस थोड़ी रिवीलिंग थी। वैसे तो मैं बड़े मॉडर्न ख़्यालों वाला हूँ पर मुझे हल्का-सा गुस्सा आया। मैं नहीं चाहता था कि उसे इस रूप में मेरे सिवा कोई और देखे। मन किया उठा के ले जाऊँ कहीं दूर उसे, ज़माने की निगाह भी ना पड़ने दूँ। मैं इन्हीं ख़्यालों में उलझा रहा और वो चलती-चलती कार के बहुत करीब आ गई। एकदम से मुझे एहसास हुआ, जल्दी से कार से निकला और फ्रंट डोर उसके लिए खोला।

"अरे, इसकी कोई ज़रूरत नहीं थी," वो गाड़ी में बैठते हुए मुस्कुराकर बोली।

शायद उसने ये उम्मीद नहीं की थी, पर मैं जानता था कि लड़कियों को ये सब अच्छा लगता है। जब आप किसी के दिल मे उतरना चाहो तो माइनर डीटेल्स का भी ख़ास ख़्याल रखना पड़ता है।

"आज तुम बहुत ख़ूबसूरत लग रही हो," मैंने ड्राइव करते हुए, बिना उसकी तरफ़ देखे, मुस्कुराते हुए कहा।

उसने भी मुस्कुराते हुए सवाल किया, "मैं तुमको कब ख़ूबसूरत नहीं लगती वैसे?"

"अब तुम मुझको हर दिन पहले से ज़्यादा ख़ूबसूरत लगती हो तो क्या कहूँ? शायद पतंजलि के प्रोडक्ट्स का कमाल है," मैंने उसे चिढ़ाते हुए कहा क्योंकि मैं जानता था कि 'बाबा रामदेव' से चिढ़ थी उसे।

"चुपचाप ड्राइविंग पर कंसन्ट्रेट करो वर्ना कूद जाऊँगी चलती गाड़ी से," उसने चिढ़कर जवाब दिया।

तो मैंने हँसते हुए कहा, "कूदना मत, वैसे ही यू.पी.की सड़कों में गड्ढे हैं, तुम कूदोगी तो खाई बन जाएगी।"

"एक्सक्यूज़ मी! मैं इतनी मोटी हूँ?" पहले से ज़्यादा चिढ़ गई इस बार वो। मुझे लगा ज़्यादा टाँग खींचना भी सही नहीं, कहीं सच में नाराज़ ना हो जाए।

मैंने बात बदलते हुए कहा, "तुमको पता है कि अभी तुम्हें देखकर मैंने एक शेर लिख दिया?"

"सच में? सुनाओ मुझे," वो चहककर बोली।

"इस लिबास में निखार लेकर आया है तेरा रूप कुछ इस तरह, निकलती है घनी बारिश के बाद धूप जिस तरह।"

शेर सुनकर उसके गाल हया से लाल हो गए। मुस्कुराते हुए बोली, "शुक्रिया! तुम्हारा यही हुनर तुमको ख़ास बनाता है।"

मैं जानता था कि शेर में दम नहीं था, पर जिसके लिए शेर कहो उसे पसंद आ जाए, और क्या चाहिए।

दिन की तेज़ गर्मी की बाद अब मौसम सुहाना हो चला था। शायद, कहीं आस-पास बारिश हो रही थी। उसने कार का ए.सी. बंद करके ग्लासेस नीचे कर दिए। हल्की-हल्की बूंदाबांदी के साथ ठंडी हवा चल रही थी और वो मौसम को एन्जॉय करती हुई कोई गाना गुनगुना रही थी। मुझे समझ तो नहीं आ रहा था, शायद कोई फोक सॉन्ग था हिमाचली में, पर सुनने में अच्छा लग रहा था।

****

एक घंटे की ड्राइव के बाद हम रेस्टोरेंट पहुँच गए। भीड़भाड़ से हटकर, शहर से दूर ये रेस्टोरेंट एक बंगले के अंदर था। चारों तरफ़ हरियाली थी। ये बंगला शायद किसी अंग्रेज़ के लिए बना होगा।

इसका मालिक ख़ुद एक आर्ट लवर था। वो ये रेस्टोरेंट शौक़ के लिए चलाता था। वर्ना कोई कैपिटलिस्ट होता तो कब के यहाँ मॉल और फ्लैट बन गए होते। मैंने कॉर्नर टेबल पहले ही बुक कर दी थी, वहाँ खिड़की से यमुना का किनारा दिखता था और दूर कहीं जाती गाड़ियों की लंबी लाइन, जिनकी सिर्फ़ हेडलाइट्स नज़र आ रही थी।

अंदर मद्धम-सी रोशनी थी। हल्की आवाज़ में 70's और 80's के गानों का म्यूजिक बज रहा था। टेबल और चेयर्स को एंटीक लुक दिया गया था। होटल की थीम किसी राजमहल जैसी थी। दीवारों पर पेंटिंग्स लगी थीं, आस-पास की हरियाली और होटल का वेंटिलेशन कुछ ऐसा था कि ए.सी. की ज़रूरत नहीं थी।

शिखा हर एक चीज़ को बहुत गहरी नज़र से देख रही थी, उसकी आँखों में बच्चों जैसी चमक थी, जैसे हर एक चीज़ को ख़ुद में समा लेना चाहती हो।

वो वहाँ के मंज़र में डूबी थी और मैं उसमें। मैंने आज तक उसे इस तरह से नहीं देखा था कभी, ऐसा लग रहा था कि ये पल बस यहीं थम जाए और मैं ताउम्र उसे देखता रहूँ बस।

जब हम अपनी टेबल पर पहुँचे तो वो मुझसे बोली, "एक्सीलेंट चॉइस साहिल, आई मस्ट से, आई एम इम्प्रेस्ड एंड आई नेवर न्यू दैट अ प्लेस लाइक दैट माइट एग्ज़िस्ट इन देल्ही एन.सी.आर.।"

"ख़ास लोगों के लिए, ख़ास जगह ढूँढनी पड़ती है, अभी तो ये इब्तिदा है, आगे-आगे देखिये होता है क्या," मैंने मुस्कुराते हुए कहा।

बारिश शुरू हो गई थी और बूंदों की आवाज़ और खिड़की से आती नरम-ठंडी हवा के झोंके किसी हसीन ख़्वाब का एहसास दे रहे थे।

खाना उम्मीद के मुताबिक एकदम लज़ीज़ था। मैं यहाँ 5 साल बाद आया था, पर हर चीज़ में आज भी वैसा ही जादू था।

खाने खाते वक़्त, बातों का सिलसिला ऐसा चला कि जब घड़ी पर नज़र गई तो साढ़े बारह बज चुके थे।

"शायद, अब चलना चाहिए हमको।"

"मैं नहीं जा रही वापस। तुम जाओ, मुझे यहीं अच्छा लग रहा है," मेरे इसरार पर वो बच्चों-सी ज़िद करती हुई बोली। मैं मुस्कुरा कर चुप हो गया।

वो मुझे देखकर हँसते हुए बोली, "तुम बहुत क्यूट हो, चलो चलते हैं अब।"

*गुलाबी पेंसिल पार्ट -4*

"कर गए वादा वो ख्वाबों में मिलने का मुझसे,
बस इसी खुशी में नींद ना आई तमाम रात।"

शनिवार शाम को मिलना था पर कमबख़्त जुम्मे की रात आँखों ही आँखों में कट गई। सुबह 7 बजे उसका व्हाट्सएप्प आया।

"गुड़ मॉर्निंग साहिल।"

"गुड़ मोर्निंग सनशाइन," मैंने जल्दी से जवाब दिया। छुट्टी के दिन उसका सात बजे उठ जाना, ये इशारा था कि आग दोनों तरफ बराबर लगी हुई थी। तभी उसका कॉल आ गया। उसकी आवाज़ में एक अजब सा नशा था। "क्या साहिल साहब, लगता है नींद नहीं आई?"

मेरे दिल के किसी कोने से आवाज़ आयी, "जुनूं नहीं मुझे कि मैं जागूं तमाम रात,
पर तेरा खयाल जगाए तो क्या करूँ?"

पर मैंने ये बात उससे कही नहीं, क्योंकि ज़्यादा प्यार और बेचैनी दिखाना नए रिश्ते की सेहत के लिए हानिकारक होता है। मैंने ऐसे ही बहाना बनाते हुए कहा "अरे रूममेट को जॉगिंग का नया नया शोक चढ़ा है, तो उसी का डोर खोलने उठा था।"

"तुम कबसे जॉगिंग स्टार्ट करोगे मोटू," उसने चहकते हुए पूछा।

"एक्सक्यूज़ मी मोहतरमा! फ़ॉर योर काइंड इन्फॉर्मेशन मेरा बॉडी मास इंडेक्स 23 है और मोटों की कैटेगरी 25 से स्टार्ट होती है। और इससे कम करके भी क्या करूँगा? औरों के लिए भी तो थोड़ा स्कोप छोड़ दूँ, वरना सब की सब मेरी ही दीवानी हो गयीं तो बाकी लड़कों का क्या होगा?"

मेरे जवाब पर वो हँसते हुए बोली, "इंजीनियर साहब हर बात पर टेक्निकेलिटि में मत घुस जाया करो," उसकी हँसी ऐसी थी जैसे मंदिर में घंटियाँ बज रही हो।

"चलो सी यू एट 8 पीएम शार्प और लेट मत करना वरना जो भी मिला 8 बजे उसके साथ चली जाऊँगी मैं। बाय फ़ॉर नाउ।" ये कहते हुए उसने फ़ोन रख दिया।
वो मेरी लेट लतीफी वाली आदत को जानती थी। मैं ऑफिस भी अक्सर लेट पहुँचता था। वो एचआर डिपार्टमेंट में थी। लेट कमिंग्स और सैलरी डिडक्शन्स वही देखती थी। और मेरी यही बुरी आदत शुरू में उससे मिलने का सबक बनी, कई बार उसने मुझे वार्न करने को बुलाया था। पर उसके वार्न पर मेरा चार्म भारी पड़ गया। नौकरी जाते जाते छोकरी झोली में आ गयी।

**

"भाई आज शाम के लिए अपनी कार दे दे प्लीज।" मैंने ऑलमोस्ट गिड़गिड़ाते हुए रूममेट से कहा।
"अबे तुझे गाड़ी क्यों चाहिए बे? तू डीटीसी में पास बनवा कर धक्के खाने वाला आदमी, तुझे कार का क्या काम आ गया? पूरे वीकेंड तो तू घर में पड़ा किताबों और लैपटॉप में घुसा रहता है," रूममेट ने हैरानी से पूछा।

फिर एक सेकंड रुक कर बोला, "गर्लफ्रैंड भी नहीं....एक मिनट..डेट पर जा रहा है भाई?"
मैंने कुछ कहा नहीं, बस मुस्कुरा दिया।

मेरी मुस्कुराहट को मेरी हाँ जानकर वो बड़े जोश में बोला, "भाई तू ये ले चाबी, आज तूने दिल खुश कर दिया। नहीं तो मुझे लगा था कि तेरी शादी की बिरयानी खाने की तमन्ना दिल में ही लिए तेरा यार दुनिया से रुखसत हो जाएगा। अच्छा ये बता क्या करती है भाभी हमारी?"

"अरे भाई पहली बार मिल रहा हूँ डिनर पर नॉर्मली, ऑफिस में साथ है और तू इतने ख़्वाब मत पाल अभी से," मैंने हँसते हुए कहा।

"भाई ये लड़की कुछ ख़ास होगी वैसे, तुझे 5 साल से जनता हूँ, पहली बार किसी लड़की के साथ डेट पर जा रहा है तू। वर्ना मुझे तो कई मर्तबा शक़ होता था तुझ पर,  इसीलिए रात को अपना डोर लॉक करके सोता था," उसकी बात पर मैं खिलखिला कर हँस पड़ा, डोर लॉक वाला कुछ ज़्यादा ही हो गया था।

ये दोस्त भी अजब किस्म के प्राणी होते हैं। तुमसे ज़्यादा एक्ससितमेंट तो इनको होती है। मैं वैसे तो बस में सफ़र करना ही पसंद करता था। ओला/ऊबर का ख्याल भी आया था दिल में पर अपनी कार हो तो बेहतर रहता है। मैंने उसकी गाड़ी कभी नहीं मांगी थी पर आज कुछ खास दिन था मेरे लिए। और इस बात का अहसास उसे भी था, तभी मान गया वर्ना आप उसकी किडनी बेचकर आईफ़ोन खरीद लो चाहे ख़ुशी ख़ुशी दे देगा, पर कार को हाथ भी ना लगाने दे किसी को।

"भाई पर एक बात का ख्याल रखना, परसों ही सर्विस कराई है, सीट्स भीगें ना बस, बरसात का मौसम है," दोस्त कार की चाबी देते हुआ बोला।

मैं बस अब बेसब्री से शाम का इंतज़ार करने लगा।

Monday, 16 October 2017

मिठास

"एक दिन मैं तुम्हें छोड़कर चली जाऊँगी, तब ढूँढ़ते रहना मुझे दुनिया भर में," इसी कुर्सी पर बैठकर उसने ये कहा था और मैंने उसकी बात को हर बार की तरह गीदड़भभकी समझ के हवा में उड़ा दिया था।

"मैं अब से तुमसे बोलना ही छोड़ दूंगी," बेडरूम से झाँकता खाली बिस्तर लगातार उसकी यही बात दोहरा रहा था।

"मैं तुम्हारे लिए जो करती हूँ उसकी तुम्हें ज़रा भी कद्र नहीं है। एक दिन कोई नहीं होगा जो तुम्हारा ध्यान रखे," सिंक में पड़े गंदे बर्तन, बाथरूम में बिखरे हुए मैले कपड़े, फर्श पर बिछी धूल की चादर और मेरा तपता माथा रह रह कर मुझे उसके इन्हीं उलहनों की याद दिला रहा था।

"तुम मुझे इतना परेशान करोगे तो मैं सब कुछ छोड़ दूँगी। नौकरी भी, घर भी और ये दुनिया भी," घर का खुला दरवाज़ा उसकी नामौजूदगी की गवाही दे रहा था।

"अब बस मैं और नहीं रोना चाहती," इसी आईने में देखते हुए उसने कहा था।

उसने बार-बार कहा था। वो रोई थी, यहाँ तक कि गिड़गिड़ा भी गई थी कई बार मेरे सामने। पर मुझे हमेशा ही ये सब औरतों वाले नाटक लगते थे। काश! मैंने उसके दर्द को अपना समझा होता। दर्द ना समझता, उसे ही समझने की कोशिश की होती।

आज वो चली गई। मैं अकेला इस घर में खुद को कोसते हुए बैठा हूँ। जानता था कि वो कभी भी मुझसे दूर जा सकती है पर कभी मानना नहीं चाहा था। शायद उसके प्यार पर कुछ ज़रूरत से ज़्यादा ही भरोसा था, इसी लिए जब-तब उसे लताड़ता रहा।

अपना हक़ जो समझता था उस पर। लेकिन भूल गया था कि हक़ के साथ ज़िम्मेदारी भी आती है और उससे भी ज़्यादा ज़रूरत होती है आपसी समझ की। उसे शायद मुझसे एक समझ भरे स्पर्श की ही दरकार थी।

आज देखो, मैं अकेला हूँ। और कोई दिन होता तो शायद मैं जश्न मना रहा होता उसके ना होने का, लेकिन आज, आज ही के दिन तो हम पहली बार मिले थे। सफ़ेद सलवार-क़मीज़ में वो आसमान से उतरी किसी परी से कम नहीं लग रही थी। सिर्फ मैं ही नहीं वो भी मुझ पर पहली ही नज़र में फ़िदा हो गई थी। कई दिनों बाद मोबाइल के ज़माने में भी चिट्ठी लिखकर उसने मुझे ये बताया था।
चिठ्ठी! शायद वो मेरे लिए कोई आखिरी चिट्ठी छोड़ कर गई हो।

दराज़?
सब की सब खाली।
रसोई के कैबिनेट?
यहाँ भी कुछ नहीं है।
मायूस होकर डाइनिंग टेबल पर आ बैठा हूँ। अरे, ये फलों की टोकरी के पास क्या है?
रिपोर्ट?

मैं पिता बनने वाला हूँ!

सारी ख़ुशी एक ही पल में काफ़ूर हो गई। इस हालत में जाने कहाँ होगी वो? कहीं ख़ुद के साथ कुछ ग़लत तो...नहीं, नहीं...ऐसा नहीं हो सकता। मैं उसको ढूँढ कर निकालूँगा।

अभी मैं घर से बाहर क़दम रखने ही वाला था कि वो कस के मेरे सीने से आ लिपटी।

"ओ, आरव! आज मैं बहुत-बहुत ख़ुश हूँ। तुमने...तुमने रिपोर्ट पढ़ ली?" उसकी नज़र मेरे हाथों में पकड़े कागज़ पर से होते हुए मेरे चेहरे तक आ पहुँची जो अब आँसुओं में भीगा था।

"अरे! ये क्या? तुम रो क्यों रहे हो? ये तो ख़ुशी की बात है, पगले।" उसने मेरे आँसू पोंछकर मुझे फिर से गले लगाते हुए कहा।

मैं कुछ नहीं कह पाया। बस ज़ोर से उसे अपनी बाँहों में भींच लिया। मेरे दिलोदिमाग में पिछले पंद्रह मिनट घूम रहे थे जो मैंने उससे बिछड़ने के डर के साये में बिताए थे। अब मैं उसे कहीं नहीं जाने दूँगा।

"लो, मिठाई खाओ।" उसने मेरे सामने बरफ़ी का डिब्बा खोलते हुए कहा। आज भी वो अपनी नहीं मेरी पसंद की मिठाई लाई थी।

"तुम कहाँ गई थी, रिया?" मैं ख़ुद को पूछने से रोक नहीं पाया।

"अरे! इतनी अच्छी ख़बर बग़ैर तुम्हारी पसंदीदा मिठाई के कैसे सुनाती! यही लेने गई थी।" उसने खिलखिलाते हुए कहा।

वो क्या जानती थी कि मेरे जीवन में मिठास तो एक सिर्फ उसके होने से ही है। वो नहीं हो तो सब खारा।