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Friday, 1 September 2017

**रात**

सबको सुलाकर आती है जगाने मुझे,
मुझसे बस अकेले में ही मिलती है रात।

रोज़ मेरे काँधे पर सर रखकर रोती है,
मेरी ही तरह बिल्कुल तन्हा है रात।

याद दिन में भी आते हैं बिछड़ने वाले हमें,
रिवायतों में लेकिन बदनाम सिर्फ़ होती है रात।

सुबह तक साथ चलता हूँ इसके मगर,
ना जाने किस मोड़ पर जुदा हो जाती है रात।

तुम्हारे जितनी ही है ये मेरे दिल को अज़ीज़,
तुम्हारी ही तरह रोज़ मुझे छोड़कर जाती है रात।

Thursday, 31 August 2017

मेरी आँखों की कमी


मेरी आँखों की कमी, दिल की रूमानी जमी,
कंहाँ हो..
मेरी गीली पलकों, होठों की छुप्पी दबी हंसी,

आज भी ज़िंदा मुझमे, तेरे साथ का अहसास,
तेरी कमी..
पूरी नहीं होती, कितनी नापु ख्वाबों की जमी,

दिन ख़फ़ा हुए, खफ़ा नहीं हुई, यादों की जमी,
आती रही..
भूली बिसरी यादें, छूकर जाती रही. तेरी कमी,

मेरी मौसम में नमी, ऐ मेरी बारिश, मेरी कमी,
कंहाँ हो..
मेरे चेहरे की अदा, क़दमों की आहट, मेरी जमी,