Friday, 1 September 2017

**रात**

सबको सुलाकर आती है जगाने मुझे,
मुझसे बस अकेले में ही मिलती है रात

रोज़ मेरे काँधे पर सर रखकर रोती है,
मेरी ही तरह बिल्कुल तन्हा है रात।

याद दिन में भी आते हैं बिछड़ने वाले हमें,
रिवायतों में लेकिन बदनाम सिर्फ़ होती है रात।

सुबह तक साथ चलता हूँ इसके मगर,
ना जाने किस मोड़ पर जुदा हो जाती है रात।

तुम्हारे जितनी ही है ये मेरे दिल को अज़ीज़,
तुम्हारी ही तरह रोज़ मुझे छोड़कर जाती है रात।

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