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Friday, 18 May 2018

खोया हुआ सच - राजेंद्र जगोत्ता

एक लीला थी जिस का दिल जानवर के प्रति भी प्यार से पसीज जाता था और दूसरी तरफ सीमा थी, अपनों का दर्द जिस के मर्म को छूता न था. शायद यही वजह थी सीमा के दुख की.

सीमा रसोई के दरवाजे से चिपकी खड़ी रही, लेकिन अपनेआप में खोए हुए उस के पति रमेश ने एक बार भी पीछे मुड़ कर नहीं देखा. बाएं हाथ में फाइलें दबाए वह चुपचाप दरवाजा ठेल कर बाहर निकल गया और धीरेधीरे उस की आंखों से ओझल हो गया.
सीमा के मुंह से एक निश्वास सा निकला, आज चौथा दिन था कि रमेश उस से एक शब्द भी नहीं बोला था. आखिर उपेक्षाभरी इस कड़वी जिंदगी के जहरीले घूंट वह कब तक पिएगी?
अन्यमनस्क सी वह रसोई के कोने में बैठ गई कि तभी पड़ोस की खिड़की से छन कर आती खिलखिलाहट की आवाज ने उसे चौंका दिया. वह दबेपांव खिड़की की ओर बढ़ गई और दरार से आंख लगा कर देखा, लीला का पति सूखे टोस्ट चाय में डुबोडुबो कर खा रहा था और लीला किसी बात पर खिलखिलाते हुए उस की कमीज में बटन टांक रही थी. चाय का आखिरी घूंट भर कर लीला का पति उठा और कमीज पहन कर बड़े प्यार से लीला का कंधा थपथपाता हुआ दफ्तर जाने के लिए बाहर निकल गया.
सीमा के मुंह से एक ठंडी आह निकल गई. कितने खुश हैं ये दोनों… रूखासूखा खा कर भी हंसतेखेलते रहते हैं. लीला का पति कैसे दुलार से उसे देखता हुआ दफ्तर गया है. उसे विश्वास नहीं होता कि यह वही लीला है, जो कुछ वर्षों पहले कालेज में भोंदू कहलाती थी. पढ़ने में फिसड्डी और महाबेवकूफ. न कपड़े पहनने की तमीज थी, न बात करने की. ढीलेढाले कपड़े पहने हर वक्त बेवकूफीभरी हरकतें करती रहती थी.
क्लासरूम से सौ गज दूर भी उसे कोई कुत्ता दिखाई पड़ जाता तो बेंत ले कर उसे मारने दौड़ती. लड़कियां हंस कर कहती थीं कि इस भोंदू से कौन शादी करेगा. तब सीमा ने ख्वाब में भी नहीं सोचा था कि एक दिन यही फूहड़ और भोंदू लीला शादी के बाद उस की पड़ोसिन बन कर आ जाएगी और वह खिड़की की दरार से चोर की तरह झांकती हुई, उसे अपने पति से असीम प्यार पाते हुए देखेगी.
दर्द की एक लहर सीमा के पूरे व्यक्त्तित्व में दौड़ गई और वह अन्यमनस्क सी वापस अपने कमरे में लौट आई.
‘‘सीमा, पानी…’’ तभी अंदर के कमरे से क्षीण सी आवाज आई.
वह उठने को हुई, लेकिन फिर ठिठक कर रुक गई. उस के नथुने फूल गए, ‘अब क्यों बुला रही हो सीमा को?’ वह बड़बड़ाई, ‘बुलाओ न अपने लाड़ले बेटे को, जो तुम्हारी वजह से हर दम मुझे दुत्कारता है और जराजरा सी बात में मुंह टेढ़ा कर लेता है, उंह.’
और प्रतिशोध की एक कुटिल मुसकान उस के चेहरे पर आ गई. अपने दोनों हाथ कमर पर रख कर वह तन कर रमेश की फोटो के सामने खड़ी हो गई, ‘‘ठीक है रमेश, तुम इसलिए मुझ से नाराज हो न, कि मैं ने तुम्हारी मां को टाइम पर खाना और दवाई नहीं दी और उस से जबान चलाई. तो लो यह सीमा का बदला, चौबीसों घंटे तो तुम अपनी मां की चौकीदारी नहीं कर सकते. सीमा सबकुछ सह सकती है, अपनी उपेक्षा नहीं. और धौंस के साथ वह तुम्हारी मां की चाकरी नहीं करेगी.’’
और उस के चेहरे की जहरीली मुसकान एकाएक एक क्रूर हंसी में बदल गई और वह खिलाखिला कर हंस पड़ी, फिर हंसतेहंसते रुक गई. यह अपनी हंसी की आवाज उसे कैसी अजीब सी, खोखली सी लग रही थी, यह उस के अंदर से रोतारोता कौन हंस रहा था? क्या यह उस के अंदर की उपेक्षित नारी अपनी उपेक्षा का बदला लेने की खुशी में हंस रही थी? पर इस बदले का बदला क्या होगा? और उस बदले का बदला…क्या उपेक्षा और बदले का यह क्रम जिंदगीभर चलता रहेगा?
आखिर कब तक वे दोनों एक ही घर की चारदीवारी में एकदूसरे के पास से अजनबियों की तरह गुजरते रहेंगे? कब तक एक ही पलंग की सीमाओं में फंसे वे दोनों, एक ही कालकोठरी में कैद 2 दुश्मन कैदियों की तरह एकदूसरे पर नफरत की फुंकारें फेंकते हुए अपनी अंधेरी रातों में जहर घोलते रहेंगे?
उसे लगा जैसे कमरे की दीवारें घूम रही हों. और वह विचलित सी हो कर धम्म से पलंग पर गिर पड़ी.
थप…थप…थप…खिड़की थपथपाने की आवाज आई और सीमा चौंक कर उठ बैठी. उस के माथे पर बल पड़ गए. वह बड़बड़ाती हुई खिड़की की ओर बढ़ी.
‘‘क्या है?’’ उस ने खिड़की खोल कर रूखे स्वर में पूछा. सामने लीला खड़ी थी, भोंदू लीला, मोटा शरीर, मोटा थुलथुल चेहरा और चेहरे पर बच्चों सी अल्हड़ता.
‘‘दीदी, डेटौल है?’’ उस ने भोलेपन से पूछा, ‘‘बिल्लू को नहलाना है. अगर डेटौल हो तो थोड़ा सा दे दो.’’
‘‘बिल्लू को,’’ सीमा ने नाक सिकोड़ कर पूछा कि तभी उस का कुत्ता बिल्लू भौंभौं करता हुआ खिड़की तक आ गया.
सीमा पीछे को हट गई और बड़बड़ाई, ‘उंह, मरे को पता नहीं मुझ से क्या नफरत है कि देखते ही भूंकता हुआ चढ़ आता है. वैसे भी कितना गंदा रहता है, हर वक्त खुजलाता ही रहता है. और इस भोंदू लीला को क्या हो गया है, कालेज में तो कुत्ते को देखते ही बेंत ले कर दौड़ पड़ती थी, पर इसे ऐसे दुलार करती है जैसे उस का अपना बच्चा हो. बेअक्ल कहीं की.’
अन्यमनस्क सी वह अंदर आई और डेटौल की शीशी ला कर लीला के हाथ में पकड़ा दी. लीला शीशी ले कर बिल्लू को दुलारते हुए मुड़ गई और उस ने घृणा से मुंह फेर कर खिड़की बंद कर ली.
पर भोंदू लीला का चेहरा जैसे खिड़की चीर कर उस की आंखों के सामने नाचने लगा. ‘उंह, अब भी वैसी ही बेवकूफ है, जैसे कालेज में थी. पर एक बात समझ में नहीं आती, इतनी साधारण शक्लसूरत की बेवकूफ व फूहड़ महिला को भी उस का क्लर्क पति ऐसे रखता है जैसे वह बहुत नायाब चीज हो. उस के लिए आएदिन कोई न कोई गिफ्ट लाता रहता है. हर महीने तनख्वाह मिलते ही मूवी दिखाने या घुमाने ले जाता है.’
खिड़की के पार उन के ठहाके गूंजते, तो सीमा हैरान होती और मन ही मन उसे लीला के पति पर गुस्सा भी आता कि आखिर उस फूहड़ लीला में ऐसा क्या है जो वह उस पर दिलोजान से फिदा है. कई बार जब सीमा का पति कईकई दिन उस से नाराज रहता तो उसे उस लीला से रश्क सा होने लगता. एक तरफ वह है जो खूबसूरत और समझदार होते हुए भी पति से उपेक्षित है और दूसरी तरफ यह भोंदू है, जो बदसूरत और बेवकूफ होते हुए भी पति से बेपनाह प्यार पाती है. सीमा के मुंह से अकसर एक ठंडी सांस निकल जाती. अपनाअपना वक्त है. अचार के साथ रोटी खाते हुए भी लीला और उस का पति ठहाके लगाते हैं. जबकि दूसरी ओर उस के घर में सातसात पकवान बनते हैं और वे उन्हें ऐसे खाते हैं जैसे खाना खाना भी एक सजा हो. जब भी वह खिड़की खोलती, उस के अंदर खालीपन का एहसास और गहरा हो जाता और वह अपने दर्द की गहराइयों में डूबने लगती.
‘‘सीमा, दवाई…’’ दूसरे कमरे से क्षीण सी आवाज आई. बीमार सास दवाई मांग रही थी. वह बेखयाली में उठ बैठी, पर द्वेष की एक लहर फिर उस के मन में दौड़ गई. ‘क्या है इस घर में मेरा, जो मैं सब की चाकरी करती रहूं? इतने सालों के बाद भी मैं इस घर में पराई हूं, अजनबी हूं,’ और वह सास की आवाज अनसुनी कर के फिर लेट गई.
तभी खिड़की के पार लीला के जोरजोर से रोने और उस के कुत्ते के कातर स्वर में भूंकने की आवाज आई. उस ने झपट कर खिड़की खोली. लीला के घर के सामने नगरपलिका की गाड़ी खड़ी थी और एक कर्मचारी उस के बिल्लू को घसीट कर गाड़ी में ले जा रहा था.
‘‘इसे मत ले जाओ, मैं तुम्हारे हाथ जोड़ती हूं,’’ लीला रोतेरोते कह रही थी.
लेकिन कर्मचारी ने कुत्ते को नहीं छोड़ा. ‘‘तुम्हारे कुत्ते को खाज है, बीमारी फैलेगी,’’ वह बोला.
‘‘प्लीज मेरे बिल्लू को मत ले जाओ. मैं डाक्टर को दिखा कर इसे ठीक करा दूंगी.’’
‘‘सुनो,’’ गाड़ी के पास खड़ा इंस्पैक्टर रोब से बोला, ‘‘इसे हम ऐसे नहीं छोड़ सकते. नगरपालिका पहुंच कर छुड़ा लाना. 2,000 रुपए जुर्माना देना पड़ेगा.’’
‘‘रुको, रुको, मैं जुर्माना दे दूंगी,’’ कह कर वह पागलों की तरह सीमा के घर की ओर भागी और सीमा को खिड़की के पास खड़ी देख कर गिड़गिड़ाते हुए बोली, ‘‘दीदी, मेरे बिल्लू को बचा लो. मुझे 2,000 रुपए उधार दे दो.’’
‘‘पागल हो गई हो क्या? इस गंदे और बीमार कुत्ते के लिए 2,000 रुपए देना चाहती हो? ले जाने दो, दूसरा कुत्ता पाल लेना,’’ सीमा बोली.
लीला ने एक बार असीम निराशा और वेदना के साथ सीमा की ओर देखा. उस की आंखों से आंसुओं की धारा बह रही थी. सहसा उस की आंखें अपने हाथ में पड़ी सोने की पतली सी एकमात्र चूड़ी पर टिक गईं. उस की आंखों में एक चमक आ गई और वह चूड़ी उतारती हुई वापस कुत्ता गाड़ी की तरफ दौड़ पड़ी.
‘‘भैया, यह लो जुर्माना. मेरे बिल्लू को छोड़ दो,’’ वह चूड़ी इंस्पैक्टर की ओर बढ़ाती हुई बोली.
इंस्पैक्टर भौचक्का सा कभी उस के हाथ में पकड़ी सोने की चूड़ी की ओर और कभी उस कुत्ते की ओर देखने लगा. सहसा उस के चेहरे पर दया की एक भावना आ गई, ‘‘इस बार छोड़ देता हूं. अब बाहर मत निकलने देना,’’ उस ने कहा और कुत्ता गाड़ी आगे बढ़ गई.
लीला एकदम कुत्ते से लिपट गई, जैसे उसे अपना खोया हुआ कोई प्रियजन मिल गया हो और वह फूटफूट कर रोने लगी.
सीमा दरवाजा खोल कर उस के पास पहुंची और बोली, ‘‘चुप हो जाओ, लीला, पागल न बनो. अब तो तुम्हारा बिल्लू छूट गया, पर क्या कोई कुत्ते के लिए भी इतना परेशान होता है?’’
लीला ने सिर उठा कर कातर दृष्टि से उस की ओर देखा. उस के चेहरे से वेदना फूट पड़ी, ‘‘ऐसा न कहो, सीमा दीदी, ऐसा न कहो. यह बिल्लू है, मेरा प्यारा बिल्लू. जानती हो, यह इतना सा था जब मेरे पति ने इसे पाला था. उन्होंने खुद चाय पीनी छोड़ दी थी और दूध बचा कर इसे पिलाते थे, प्यार से इसे पुचकारते थे, दुलारते थे. और अब, अब मैं इसे दुत्कार कर छोड़ दूं, जल्लादों के हवाले कर दूं, इसलिए कि यह बूढ़ा हो गया है, बीमार है, इसे खुजली हो गई है. नहीं दीदी, नहीं, मैं इस की सेवा करूंगी, इस के जख्म धोऊंगी क्योंकि यह मेरे लिए साधारण कुत्ता नहीं है, यह बिल्लू है, मेरे पति का जान से भी प्यारा बिल्लू. और जो चीज मेरे पति को प्यारी है, वह मुझे भी प्यारी है, चाहे वह बीमार कुत्ता ही क्यों न हो.’’
सीमा ठगी सी खड़ी रह गई. आंसुओं के सागर में डूबी यह भोंदू क्या कह रही है. उसे लगा जैसे लीला के शब्द उस के कानों के परदों पर हथौड़ों की तरह पड़ रहे हों और उस का बिल्लू भौंभौं कर के उसे अपने घर से भगा देना चाहता हो.
अकस्मात ही उस की रुलाई फूट पड़ी और उस ने लीला का आंसुओंभरा चेहरा अपने दोनों हाथों में भर लिया, ‘‘मत रो, मेरी लीला, आज तुम ने मेरी आंखों के जाले साफ कर दिए हैं. आज मैं समझ गई कि तुम्हारा पति तुम से इतना प्यार क्यों करता है. तुम उस जानवर को भी प्यार करती हो जो तुम्हारे पति को प्यारा है. और मैं, मैं उन इंसानों से प्यार करने की भी कीमत मांगती हूं, जो अटूट बंधनों से मेरे पति के मन के साथ बंधे हैं. तुम्हारे घर का जर्राजर्रा तुम्हारे प्यार का दीवाना है और मेरे घर की एकएक ईंट मुझे अजनबी समझती है. लेकिन अब नहीं, मेरी लीला, अब ऐसा नहीं होगा.’’
लीला ने हैरान हो कर सीमा को देखा. सीमा ने अपने घर की तरफ रुख कर लिया. अपनी गलतियों को सुधारने की प्रबल इच्छा उस की आंखों में दिख रही थी.

Tuesday, 1 May 2018

गज़ल - जिसे हालात ने मारा हो मुहब्बत कैसे वो कर ले

जिसे हालात ने मारा हो मुहब्बत कैसे वो कर ले,
जो खुद टूटा सितारा हो मुहब्बत कैसे वो कर ले,
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सहारा देना पड़ता है इक दूजे को मुश्किल में,
जो खुद ही बेसहारा हो मुहब्बत कैसे वो कर ले,
==============================
जीने के लिए छत भी ज़रूरी होती है सर पर,
जो खुद बेघर बेचारा हो मुहब्बत कैसे वो कर ले,
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जीत है लाज़िमी शतरंज की बाज़ी हो या दिल की,
जो खुद दुनिया से हारा हो मुहब्बत कैसे वो कर ले,
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ना कोई राह ना मंज़िल ना जीने का कोई मकसद,
जो खुद बादल आवारा हो मुहब्बत कैसे वो कर ले,
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आभार सहित :- भरत मल्होत्रा।

Friday, 13 April 2018

तुम्ही तुम

‌‌‍तुम्ही तुम क्यो नजर आते हो
हर पल हर क्षण क्यो सताते हो
ख्वाबो मे तुम दिखते हो
हकिकत में भी सामने आ जाते हो
हर मुश्किल काम आसान बनाते हो
और आसान को भी मुश्किल कर देते हो
कभी बच्चो की तरह रोते हो तो
कभी बड़े बन समझाते हो
खुद रूठते हो खुद मान जाते हो
मुझे मनाने का अवसर ही कहां देते हो
कभी शिकायतें हजार करते हो
कभी तारीफो की पुल बॉध देते हो
शुरूआत तुम्ही करते हो
अंत भी जल्द कर देते हो
मुझे तो बीच मे ही अकेला छोड़ देते हो
कभी चॉद देखने की बात करते हो
कभी मुझमे ही चॉद देखते हो
क्या कहूँ तुझे मैं
तुम्हारी हर अदा निराली है
बस ज्यादा नखरे ना दिखाना
क्योकि अब हमारी बारी हैं।

निवेदिता चतुर्वेदी’निव्या’

गजल - तमन्ना उसकी की है जो कभी हांसिल नहीँ होगा


तमन्ना उसकी की है जो कभी हांसिल नहीँ होगा
कभी कश्ती की बाहों में कोई साहिल नहीं होगा।

जला दूं तुम कहो तो दिल की हर ख्वाहिशें अपनी
मगर फिर भी हमारा दिल तेरे क़ाबिल नहीं होगा।

बहुत समझा लिया है हमने अपने दिलको हमदम
तेरी दुनिया में दोबारा ये दिल शामिल नहीं होगा।

भरोसा कर लिया मैंने लगाया इल्ज़ाम जो तुमने
सफ़ाई दें भी क्या अपनी गवाह हाज़िर नहीँ होगा।

अब चलो हम हार जाते हैं जब हमको हारना ही है
दिल्लगी के खेल में तुमसे बड़ा माहिर नहीं होगा।

हां बड़े अहसान हैं हमपर खुदाया शुक्रिया है तेरा
दर्द ए उल्फत में भी जानिब दिल काफिर नहीँ होगा।

— पावनी

Wednesday, 28 March 2018

जाम नजरों के - Quote by Ravindra Gangwar

थोड़ा और करीब आओ ना, इश्क करने को जी चाहता है !
तुम जाम अपनी नजरों से पिलाना, मैं थोड़ा और बहक जाऊं !!

ये दुनिया - Quote by Ravindra Gangwar

ये जो दुनिया है ना, कभी-कभी अजीब सी लगती है !
खुश है खुद से, फिर क्यों नाखुश दूसरे से लगती है !!

कहे जो कभी कोई, तो बात तू ना मान उसकी !
है जहर घुला हर मन में, फिर भी कभी साथ तो देती है !!

खामोशियां - Quote by Ravindra Gangwar

बर्बाद रातों के सिवा, अब कुछ नहीं पास मेरे !
बस खामोशियां हैं, और कुछ सिसकियां !!

Tuesday, 27 March 2018

Sunday, 19 November 2017

*जुदाई का एक ख़त*

*जुदाई का एक ख़त*

जानां!

जानती हो ,
रोज़ सोचता हूँ एक ख़त लिखूँ तुमको, वही ख़त जो मैंने अपने इश्क़ के पहले दिन से लिखना चाहा था। लेकिन कभी लिख नहीं पाया लेकिन सोच रहा हूँ आज लिखूँ, फिर अगले ही पल सोचता हूँ कि क्या वो खत कभी पहुँचा पाऊंगा तुमको और अगर कभी तुमको मिल भी गया तो क्या तुम पढ़ोगी उसको?
क्या तुम पढ़ पाओगी या यूँ कहूँ कि महसूस कर पाओगी उनको क्योंकि शब्दों को पढ़ा नही महसूस किया जाता है। क्या तुम महसूस कर पाओगी कि कितना अकेला हो गया हूँ मैं?

अगर मेरी इस लाइन को तुमने महसूस किया होगा तो मुझे शायद ये बताना नहीं पड़ेगा कि  कितना ज़्यादा अकेला हो गया हूँ मैं। कैसे बताऊँ कि कभी-कभी बहुत कुछ लिखना चाहता हूँ लेकिन पन्ने फटते हैं, कलम चलती है और कोई भी कहानी या कविता पूरी नहीं हो पाती क्योंकि शब्द तो खो गए हैं ना मेरे।

तुम जो खो गयी हो ना, जानती हो दिन बहुत उदास रहने लगे है मेरे और रात मुझे घूरती है हर रोज़ बुझने तक। बालकनी मेरी सबसे पसंदीदा जगह हो गयी है, कभी-कभी तो पूरी रात वहाँ बीत जाती है। हाँ, सच मे पूरी रात!

कभी कभी तो लैम्पपोस्ट के इन लाइटों से भी चिढ़ होती है, जी करता है कि फोड़ दूँ इनको। कभी मन करता है रोड पर चल रहे या आसपास रह रहे हर किसी से बात करूं और कभी सोचता हूँ कि इतना शांत हो जाऊं कि किसी की आवाज़ ही ना सुनाई दे, और सुनूँ तुम्हारी साथ की गयी हर बात को।

मुझे अपने आस पास की हर चीज़ महसूस होती है। नल से टिप-टिप रिसता पानी, घड़ी की टिक-टिक करती आवाज़, पंखे का शोर, अगर कुुछ नहींं सुनाई देती हैै तो तुम्हारे लौट आने की उम्मीद।

जानाँ, मैंने सच में सिर्फ तुमसे प्यार किया था सिर्फ तुमसे। तुम्हारे साथ बिताया हुआ हर एक पल एक फ़िल्म की तरह चलता रहता है आंखों के सामने, हाँ वही दो या तीन महीने ही जो तुमको बहुत कम समय लगा था और मुझे बहुत बड़ा क्योंकि उन दिनों को नहीं, मैंने तो पलों को जिया था ना। उन पलों को जिनमें तुम पास थी, साथ थी।

और भी बहुत कुछ है लिखने को जो मेरे शब्द समेट नहीं पा रहे, और कलम लिख नहीं पा रही, सो बस।

हाँ कभी कभी रो भी लेता हूँ, लड़के भी रोते हैं।
आज अकेलापन सारी सीमाएं पार कर रहा है।

सुनो ना! अगर हो सके तो लौट आओ मैं ये तो नहीं कहूंगा कि मैं दुनिया मे सबसे ज़्यादा प्यार दूंगा तुमको, लेकिन ये वादा है तुमसे कि मेरी दुनिया के सारे प्यार पर सिर्फ तुम्हारा हक़ होगा।

लौट आओ ना प्लीज़।

तुम्हारे खत के इंतज़ार में...

Thursday, 16 November 2017

Ravindra Gangwar quote

होगी मुलाकात उनसे मुमकिन नहीं लगता,
गर हैं दिल पास उसका एहसास तो हो !
धड़कने यूं उलझ कर रह गयीं उनके लफ्जों में,
करते हैं वो मुझसे प्यार फिर कोई जज्बात तो हो !!

Saturday, 11 November 2017

Ravindra Gangwar quotes

#मोहब्बत #मजबूरी #जीना #फना #प्यार #इश्क़ #yqbaba #ravindragangwar Follow my writings on https://www.yourquote.in/ravindrakumar19946 #yourquote

फांसले यूं बढ़ने लगे तेरे मेरे दरमियान,
कि अब तुझको याद करने से डर लगता है !
हुए थे फना मोहब्बत में तेरी इस कदर कभी,
कि अब तो जीना भी मजबूरी लगती है !!

Thursday, 9 November 2017

*पायल - एक प्रेम कहानी*

*पायल - एक प्रेम कहानी*

सर्दी हल्की दस्तक दे चुकी थी। खिड़की से आ रही ठंडी हवाओं के झोंके मन को छुए जा रहे थे। अभी मैं कॉफ़ी पीने के लिए अपने कमरे में बैठा ही था कि मेरी नज़र पास रखी अपनी डायरी पर पड़ी। ना जाने क्यों मेरा दिल उस डायरी की तरफ़ खिंचता चला गया।

हाथों में डायरी लिए धीरे-धीरे मैं उसके पन्ने पलटने लगा। कभी कोई बात बड़े चाव से पढ़ता, तो कभी कोई चीज़ पढ़कर ज़ोर से हँसने लगता। तभी अगले पन्ने के बीच एक सालों पुरानी चिट्ठी मेरे आँखों के सामने थी। उसे देख दिल एकदम ठहर-सा गया। इस चिट्ठी को देख फिर से मैं बनारस की यादों में खोने लगा और उन्हीं यादों में हँसती मुस्कुराती पायल, एकदम से मेरे दिलो-दिमाग पर छाने लगी।

पायल से मेरी पहली मुलाक़ात बनारस के घाटों पर हुई थी। उस समय मैं नया-नया बनारस आया था। बचपन से ही मुझे घूमने का बड़ा शौक था तो आते ही पहुँच गया घाट घूमने। बैकग्राउंड में बजता भजन, चेहरे को चूमती हल्की-हल्की हवा और साथ में गंगा मइया; मुझे और क्या चाहिए था। मैं घाट के सीढ़ियों पर बैठे-बैठे आनंदित हुए जा रहा था। तभी मैंने सोचा नाव पर बैठ उस पार भी जाकर थोड़ा घूम लूँ। तो बस झट से किनारे लगी नाव पर बैठ गया।

थोड़ी देर बाद जब नाव पूरी भर गयी तो चल पड़ी। आहिस्ते-आहिस्ते मन रोमांचित हुए जा रहा था। मैं इतना खुश था कि पानी को अपने हाथों से सहलाए जा रहा था। तभी मेरी नज़र सामने बैठी एक लड़की पर पड़ी। वो मुझे देख मुस्कुराए जा रही थी।

मैंने झट से पानी में से हाथ खींच लिया और इधर-उधर देखने लगा। चोर नज़रों से मैंने फिर से उस लड़की को देखा, देखने में तो इतनी सुन्दर थी कि एक बार में ही देखकर प्यार हो जाए, पर कम्बख़्त, अभी भी वो मुझे देख बेपरवाह मुस्कुराए जा रही थी।

मुझे कुछ शक़ हुआ। मैंने अपनी तिरछी नजरों से खुद को टटोला। तभी मैंने पाया कि मेरी पैंट की ज़िप खुली हुई थी। मैं एकदम शर्म से लाल हो गया, फ़ौरन ही किसी तरह नज़र बचाकर उसे बंद किया। कम्बख़्त, आज बीच पानी में मेरी इज़्ज़त पानी-पानी हो चुकी थी। उस लड़की पर गुस्सा भी आ रहा था, साथ ही ना जाने क्यों उसकी मुस्कराहट दिल को पसंद भी आ गई थी। नाव उस किनारे लगते ही मैं उतरकर घूमने लगा। तभी किसी ने पीछे से आवाज दी 'सुनो!' मैंने मुड़कर देखा तो वही लड़की थी।

उसने बिना कुछ और बोले झट से 'सॉरी' बोल दिया।

"कोई बात नहीं, कम्बख़्त, आजकल हर चीज मेरी खुली ही रह रही है," मैंने अपनी शर्ट के बटन बंद करते हुए कहा।

वो खिलखिला पड़ी और बोली "फिर भी, मुझे हँसना नहीं चाहिए था।"

तभी मैं फटाक से बोल पड़ा "इसी बहाने आप मुस्कुराई तो, और आप मुस्कुराते हुए अच्छी लगती हो।"

वो कुछ देर तक एकटक मुझे देखने लगी। मैंने पूछा, "क्या हुआ?" वो कुछ नहीं बोली, पर उसके होंठों पर हल्की मुस्कुराहट फैल गई।

लौटते समय थोड़ा अंधेरा हो चुका था। नाव पर सिर्फ़ चार लोग थे; एक नवविवाहित जोड़ा और हम दोनों। वो मेरे ही बगल में आकर बैठ गई। नाव धीरे-धीरे चल पड़ी। कुछ देर बाद नाव थोड़ी हिचकोले खाने लगी। मैं अभी कुछ समझ पाता कि उसने मेरे हाथों को पकड़ लिया। उन नर्म हाथों के स्पर्श ने मेरे रोम-रोम को रोमांचित-सा कर दिया। मैं उसकी तरफ देखने लगा, वो अभी भी मुस्कुरा रही थी। मैंने बड़े प्यार से कहा "तुम मुस्कुरा क्यों रही हो? कहीं फिर से कुछ खुला रह गया क्या?" वो खिलखिला कर हँसने लगी, बोली "नहीं, बस यूं ही। तुमने ही बोला था ना कि मैं मुस्कुराते हुए अच्छी लगती हूँ," इतना कहकर उसने अपना सिर मेरे कंधों पर रख दिया।

मैं इस नए एहसास में खोता जा रहा था। दिल में नए जज़्बात करवट ले रहे थे। धड़कनें पहली बार सीने में शोर मचा रहीं थी। समझ नहीं पा रहा था कि ये हक़ीक़त है या कोई ख़ूबसूरत सपना। परन्तु जो भी था, वो पल कल्पना से परे था।

हवाएँ उसकी ज़ुल्फ़ों से अठखेलियाँ कर रही थी और मैं बस उनमें खोता जा रहा था। तभी नाविक की "उतर जा, भैया" की आवाज़ ने मुझे डरा-सा दिया। हम दोनों नाव से उतरकर घाट की सीढ़ियों से गुज़रते हुए ऊपर जा पहुँचे।

अभी भी उसका हाथ मेरे हाथों में ही था। तभी उसने कहा "चलो! रबड़ी खाते हैं। उस दुकान पर यहाँ की सबसे अच्छी रबड़ी मिलती है," मैंने भी हामी भर दी। खाते-खाते हम दोनों अपनी बातें साझा करने लगे। उसका नाम 'पायल' था। बिल्कुल अपने नाम की तरह वो जहाँ से गुज़रती, खुशियों की आहट आसपास गूँज पड़ती।

पूछने पर बताया कि वो यहीं की थी। घर बनारस ही था। वो बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती थी और बाक़ी समय में सिलाई और घर के कामों में माँ के साथ हाथ बँटाती थी। आज रविवार था, इसलिए फ़ुरसत में घूमने चली आई थी। कुछ देर और बात करने के बाद उसने कहा "अच्छा! चलती हूँ। माँ देर से घर पहुँचने पर गुस्सा करेगी।"

मैंने उसका हाथ पकड़ते हुए पूछा "फिर कब मिलेंगे?"

वो बिना कुछ बोले जाने लगी। आगे कुछ दूर बढ़कर उसने मुड़कर मुस्कुराते हुए कहा "अगले रविवार को, यहीं पर। और हाँ! अगली बार कुछ खुला नहीं रहना चाहिए," ये सुनकर मैं ज़ोर से हँस पड़ा।

अब हर रविवार का मैं बेसब्री से इंतज़ार करने लगा। उस दिन हम वहीं घाट पर मिलते, नाव में घूमते, रबड़ी खाते, और कभी-कभी पान भी। उसे पान खाते देख, मेरी हँसी मानो रुकती ही नहीं। पान मुँह में भरे जब बात करती तो और प्यारी लगती।

मैं पूछता "तुम्हारी माँ कुछ बोलती नहीं, पान खाने को लेकर?" तो बोलती "बनारस में रहकर पान से बैर? ना बाबा ना!"

वो हरदम पूछती "कितना प्यार करते हो हमसे?" और हर बार मैं बिना कुछ बोले उसे अपनी बाँहों में ज़ोर से भर लेता, फिर वो चुप हो जाती। कुछ देर बाद वो अपने घर लौट जाती और मैं अपने रूम। उसके साथ बिताए उन तीन घंटों को याद कर मैं हर दिन ख़ुश रहा करता था।

उसके साथ कब एक साल गुजर गया, पता तक ना चला। कुछ दिनों में मैं घर जाने वाला था। कॉलेज में दो महीने की छुट्टी होने वाली थी। एक साल बाद मेरी पढ़ाई भी पूरी होने वाली थी, और शायद नौकरी भी पक्की थी। इसलिए मैंने अपने और पायल के प्यार को शादी के बंधन में बाँधने का ठान लिया था। सोमवार की सुबह ही मेरी ट्रेन थी, तो मैंने सोचा इस रविवार जब वो आएगी, तब दिल की हर बात उससे बोल दूँगा।

रविवार आते ही मैं वहाँ पहुँच गया। आज घर जाने के पहले उसे जी भर के देखना चाहता था। बाँहों में भर बेइंतेहा मोहब्बत करना चाहता था। घाट पर से जो भी लड़की गुजरती, उनमें मैं उसे ही तलाश करता। पर वो आज कहीं दिख नहीं रही थी। शाम धीरे-धीरे ढल गई, पर वो नहीं आई। हल्की रोशनी में घाट किनारे बैठ सोचता रहा, आख़िर वो आज क्यों नहीं आई? मन में कई सवाल दस्तक दे रहे थे। पर फिर मैंने सोचा दो महीने की तो बात है, आकर भी तो बोल सकता हूँ। यही सोचकर मैं वहाँ से निकल पड़ा।

अगले दिन सुबह मैं ट्रेन पकड़ वापस घर के लिए निकल पड़ा। घर जाकर अच्छा लग रहा था, पर पायल की कमी भी बहुत महसूस हो रही थी। जैसे ही मेरा कॉलेज खुला, मैं फ़ौरन बनारस पहुँच गया।

रविवार के दिन फिर से मैं वहीं उसका इंतजार कर रहा था। पर आज भी वो नहीं आई। तभी मुझे याद आया, घर जाने से पहले एकबार जब मैंने अपने रूम का पता उसे दिया था, उसी दिन उसने भी अपने घर का पता दिया था। बोली थी "जब रविवार के बाद भी मन ना भरे तो आ जाना, दिख जाऊँगी इस गली के नीले मकान में, फिर बताना कितना प्यार करते हो हमसे?"

मैं पर्स से वो पता निकाल कर दौड़ पड़ा। पता नहीं क्यों आज उसे देखने की बेसब्री बढ़ चुकी थी। मैं बैचेन-सा दौड़े जा रहा था। साँसे फूल रहीं थी पर कदम रोके नहीं रुक रहे थे। मैं जैसे ही उस गली में पहुँचा, मुझे कुछ अटपटा-सा लगा। हर घर के बाहर अधनंगे कपड़ों में कुछ औरतें और कुछ लड़कियाँ बैठी हुई थी। इशारों से मुझे बुलाने की कोशिश कर रही थी।

मैं एकदम परेशान-सा हो गया। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था, तभी वो नीला मकान मुझे दिखा। मैं फ़ौरन उसकी तरफ़ दौड़ पड़ा। नीले मकान के पास बैठी एक अधेड़ उम्र की औरत से जब मैंने पायल के बारे में पूछा तो उसने कहा "पायल से लेकर यहाँ सपना, स्वीटी, झुमकी सब मिलेगी। तू बता, पैसा कितना है तेरे पास, चिकने? उस हिसाब से मैं तय करती हूँ," मेरे पाँव तले जमीन खिसक चुकी थी।
मैं वहाँ से पागलों की तरह भागा। भागते-भागते मैं सोचे जा रहा था, कहीं ये बुरा सपना तो नहीं है। आँखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था। रूम पर पहुँचते ही मैं दरवाज़ा बंद कर बदहवास-सा लेट गया। तभी दरवाज़े से सटे कोने में धूल से लिपटी हुई एक चिट्ठी दिखी। शायद मेरे जाने के बाद दरवाज़े के नीचे से किसी ने डालकर छोड़ दिया था। मैं फ़ौरन उसे झाड़कर खोलने लगा, तारीख़ देखी तो लगभग दो महीने पुरानी थी। चिट्ठी खोलते ही मुझे पायल का नाम दिखा, मैं दिल में मचे इस तूफ़ान के साथ उस चिट्ठी को पढ़ने लगा,

"राहुल,

जब मैं तुमसे पहली बार मिली, तब ही मैं तुम्हें बताना चाहती थी कि मैं कौन हूँ। पर कभी सच नहीं बता पाई। अपनी ज़ुबां से तुम्हें ये सब बताने की हिम्मत नहीं हुई कभी। इसलिए मैंने अपने घर का पता तुम्हें दिया था। शायद अब तक तुम्हें मेरा सच मालूम भी हो चुका होगा। पर पता है जब तुमने हमारी पहली मुलाकात के दिन मुझसे कहा कि मैं मुस्कुराते हुए अच्छी लगती हूँ, तब पहली बार लगा कि जैसे किसी ने मेरी ख़ूबसूरती की तारीफ़ की है। नहीं तो लोग बस मेरे जिस्म की तरफ़ हवस की नज़रों से ही देखते थे।

पहली बार मुझे ख़ुद के ख़ूबसूरत होने का एहसास हुआ था। पहली बार किसी की आँखों में अपने लिए इज़्ज़त और प्यार दिखा। जब भी तुमसे मिलती, मैं ये भूल-सी जाती थी कि मैं एक वेश्या हूँ, जो चंद रुपयों के लिए अपने जिस्म को किसी भी ग़ैर मर्द के हाथों में सौंप देती है।

करती भी क्या? बाबूजी बचपन में ही चल बसे थे और पिछले तीन सालों से मेरी माँ अस्पताल में भर्ती थीं। रोज़ इतना पैसा मैं कहाँ से लाती? ऊपर से दो बहनों की पढ़ाई का खर्चा कहाँ से जुटाती?

अपने जिस्म की कुर्बानी देने के सिवा मेरे पास और कोई चारा नहीं था। पर इस रविवार मेरी माँ चल बसी। मैं अपनी बहनों को लेकर अब इलाहाबाद जा रही हूँ। वहीं रहकर इनकी परवरिश करूँगी। मुझे ढूँढने की कोशिश मत करना। तुमसे इतने दिनों तक झूठ बोलने के बाद मैं ख़ुद को कभी माफ़ नहीं कर पाऊँगी। हो सके तो मुझे माफ़ कर देना।

तुम्हारे साथ बिताए वो हर रविवार के तीन घंटे मैं ज़िंदग़ी भर भूल नहीं पाऊँगी। तुम्हारा वो सच्चा प्यार मुझे ज़िंदग़ी भर याद रहेगा। तुमसे बिछड़ने का ग़म तुमसे ज़्यादा मुझे हो रहा है। पर अपने इतने बड़े सच को तुमसे छिपाकर अपनी नज़रों में ही मैं गिर चुकी हूँ। मैं भी दिल से लाचार हो चुकी थी। तुमसे बेहद प्यार करने लगी थी मैं। जब भी मैं तुमसे पूछती "कितना प्यार करते हो हमसे?" तो तुम अपनी बाँहों में मुझे भर लेते।

सच कहूँ तो मैं हर दिन सोचती कि आज अपनी सच्चाई तुम्हें बता दूँगी, पर उन बाँहों के घेरे को मैं खोना भी नहीं चाहती थी। कहीं तुम मेरा सच जान मुझे छोड़ ना दो, इसी वजह से अपनी सच्चाई छिपाती रही। अब हिम्मत नहीं है तुम्हारे सामने आने की। तुम हमेशा खुश रहो, मैं भगवान से दुआ करूँगी।

मुझे भूल जाना। मैं तुम्हारे क़ाबिल नहीं हूँ।

और अपना ख़्याल रखना,

तुम्हारी,
'पायल'

ख़त पढ़ते-पढ़ते आँसुओं से मैं भीग चुका था। उसे याद कर रोए जा रहा था। इस कड़वे सच को मैं हज़म नहीं कर पाया था। पर अभी भी मेरे दिल में उसके लिए वही इज़्ज़त थी। मैं उसे अब भी पागलों की तरह चाहता था।

कुछ दिन बाद मैं इलाहाबाद भी गया, पर बिना उसके आशियाने का पता जाने उसे कैसे ढूँढ़ता। लाख कोशिशों के बाद भी वो नहीं मिली। भारी दिल और नम आँखों के साथ मैं बनारस लौट आया। अब घाट भी जाना लगभग बंद ही कर दिया। जब भी रविवार आता, एक उदासी मुझे घेर लेती। उसके साथ बिताए पलों को याद कर कभी रात की ख़ामोशी में मुस्कुराते-मुस्कुराते रो पड़ता।

और आज फिर से इस ख़त को पढ़ मैं रोए जा रहा हूँ। चलो! अब ये डायरी भी बंद कर देता हूँ और ये ख़त भी। अपने टूटे दिल के टुकड़ों को समेट अब सो जाता हूँ। आज रविवार है, वो आती ही होगी। अब उससे मुलाक़ात हमारी सपने में ही होती है। हम रबड़ी भी खाते हैं और पान भी। दिल चाहता है ताउम्र इसी नींद में रहूँ। उसका साथ छोड़ने का दिल नहीं करता। पर सपने शायद टूटने के लिए ही बने होते हैं, सपनों में ज़्यादा देर ठहरा नहीं जाता।

'गुड नाईट'

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