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Friday, 18 May 2018

तुम को ढूंढ़ा करती हैं - रवि प्रभात

 पुरे आठ पहर नज़रे
तुम को ढूंढ़ा करती हैं

किसी के आहट पे
तुम को ढूंढ़ा करती हैं

एहसास तो पास का होता है
पर नज़रे उदास होती है

तेरे बेरुखी आदतों ने
मुझे उदास कर रखा है

तुम दिख जाओ एक बार
इस चाह में
बार बार पलटा करता हूँ

फिर वही खालीपन
और वही ख़ामोशी
मुझे चिढ़ा जाती है

पुरे आठ पहर नज़रे
तुम को ढूंढ़ा करती है

Monday, 30 April 2018

ठुकराओ अब कि प्यार करो मैं नशे में हूँ - शाहिद कबीर

ठुकराओ अब कि प्यार करो मैं नशे में हूँ

जो चाहो मेरे यार करो मैं नशे में हूँ

अब भी दिला रहा हूँ यक़ीन-ए-वफ़ा मगर

मेरा न ए'तिबार करो मैं नशे में हूँ

अब तुम को इख़्तियार है ऐ अहल-ए-कारवाँ

जो राह इख़्तियार करो मैं नशे में हूँ

गिरने दो तुम मुझे मिरा साग़र संभाल लो

इतना तो मेरे यार करो मैं नशे में हूँ

अपनी जिसे नहीं उसे 'शाहिद' की क्या ख़बर

तुम उस का इंतिज़ार करो मैं नशे में हूँ

Saturday, 28 April 2018

पेड़ के पत्तों में हलचल है ख़बर-दार से हैं - गुलज़ार

पेड़ के पत्तों में हलचल है ख़बर-दार से हैं

शाम से तेज़ हवा चलने के आसार से हैं

नाख़ुदा देख रहा है कि मैं गिर्दाब में हूँ

और जो पुल पे खड़े लोग हैं अख़बार से हैं

चढ़ते सैलाब में साहिल ने तो मुँह ढाँप लिया

लोग पानी का कफ़न लेने को तय्यार से हैं

कल तवारीख़ में दफ़नाए गए थे जो लोग

उन के साए अभी दरवाज़ों पे बेदार से हैं

वक़्त के तीर तो सीने पे सँभाले हम ने

और जो नील पड़े हैं तिरी गुफ़्तार से हैं

रूह से छीले हुए जिस्म जहाँ बिकते हैं

हम को भी बेच दे हम भी उसी बाज़ार से हैं

जब से वो अहल-ए-सियासत में हुए हैं शामिल

कुछ अदू के हैं तो कुछ मेरे तरफ़-दार से हैं

Wednesday, 25 April 2018

कर्ब चेहरों पे सजाते हुए मर जाते हैं - मालिकज़ादा जावेद

कर्ब चेहरों पे सजाते हुए मर जाते हैं

हम वतन छोड़ के जाते हुए मर जाते हैं

ज़िंदगी एक कहानी के सिवा कुछ भी नहीं

लोग किरदार निभाते हुए मर जाते हैं

उम्र-भर जिन को मयस्सर नहीं होती मंज़िल

ख़ाक राहों में उड़ाते हुए मर जाते हैं

कुछ परिंदे हैं जो सूखे हुए दरियाओं से

इल्म की प्यास बुझाते हुए मर जाते हैं

ज़िंदा रहते हैं कई लोग मुसाफ़िर की तरह

जो सफ़र में कहीं जाते हुए मर जाते हैं

उन का पैग़ाम मिला करता है ग़ैरों से मुझे

वो मिरे पास ख़ुद आते हुए मर जाते हैं

जिन को अपनों से तवज्जोह नहीं मिलती 'जावेद'

हाथ ग़ैरों से मिलाते हुए मर जाते हैं

Tuesday, 24 April 2018

तन्हा दिल की दीवारों पर - अंजु गुप्ता

 तन्हा दिल की दीवारों पर
कुछ परछाइयां मंडराती हैं !
कभी छेड़ें दिल के तारों को,
कभी एकाँकी कर जाती हैं ! !

कभी पंख लगा के हसरतें,
अल्हड़पन में पहुंच जाती हैं !
खुशियों भरी प्यारी राहें,
फिर वापिस मुझे बुलाती हैं ! !

कुछ अनुत्तरित बातें जीवन की
अस्तित्व मेरी झुठलाती हैं !
आँखों की नमी ओढ़ मुस्कुराहट,
फिर बेचैनी मेरी छुपातीं हैं ! !

क्यों दिल की दीवारों पर
कुछ परछाइयां मंडराती हैं !
क्यों छेड़ें दिल के तारों को,
क्यों एकाँकी कर जाती हैं ! !

अंजु गुप्ता

वक्त का वक्त क्या है पता कीजिए - कुमार अरविन्द

 गजल : कुमार अरविन्द

वक्त का वक्त क्या है पता कीजिए |
बाखुदा हूं ‘ खुदा बाखुदा कीजिए |

दर्दे – दिल आज मेरे मुखालिब रहे |
सुखनवर से उन्हें ‘ आशना कीजिए |

चांद तक की अदा कुछ सँवर जायेगी |
अश्क आंखों से गर आबशा कीजिए |

कल्बे – रहबर इनायत बनी गर रहे |
चंद – लम्हों में फिर राब्ता कीजिए |

मशवरा ये हुकूमत तुम्हीं से लेगी |
नौजवानों खड़ा ‘ काफिला कीजिए |

जब वरक लफ्ज तेरे आगोश मे हैं |
दर्दे दिल लिख के ही रतजगा कीजिए |

मुझको अरविन्द हर सू नजर आते हैं |
मोजिज़ा ही सही मोजिज़ा कीजिए |

बाखुदा – खुदा के लिए , मुख़ालिब – आमने सामने , सुखनवर – शायर , आशना – परिचय , आबशा/आबशार – झरना , कल्बे रहबर – पथप्रदर्शक की पहले , राब्ता – मुलाकात , वरक – पन्ना , मोजिज़ा – चमत्कार

बातें ही बातें हैं...भगवती प्रसाद व्यास 'नीरद'

चाहत मेरी पहचानता नहीं ,
दिल की बातें वह जानता नहीं !!

फूलों की माला है चुनी बुनी ,
बांध चुके गांठें मानता नहीं !!

आंखों में नींदों की खता कहां ,
आस चढ़ी सूली जानता नहीं !!

अलकें हैं काली सी घटा यहां ,
भीगें हम दोनों मानता नही !!

बातें ही बातें हैं अदा कभी ,
सब कुछ पायेगा मानता नहीं !!

अपनों ने अकसर दी सज़ा यहां ,
गैरों के दिल की जानता नहीं !!

खुशबू को बांधा है यदा कदा ,
वक़्त ठहर जाये ठानता नहीं !!

हमने तो बुन डाले सपन कई ,
पल ने जो ठानी मानता नहीं !!

दुनिया में मतवाला दिखे वही ,
सूरत दूजी पहचानता नहीं !!

Saturday, 21 April 2018

अरमान - रामनरेश त्रिपाठी

है शौक यही, अरमान यही
हम कुछ करके दिखलाएँगे,
मरने वाली दुनिया में हम
अमरों में नाम लिखाएँगे।
जो लोग गरीब भिखारी हैं
जिन पर न किसी की छाया है,
हम उनको गले लगाएँगे
हम उनको सुखी बनाएँगे।
जो लोग अँधेरे घर में हैं
अपनी ही नहीं नजर में हैं,
हम उनके कोने कोने में
उद्यम का दीप जलाएँगे।
जो लोग हारकर बैठे हैं
उम्मीद मारकर बैठे हैं,
हम उनके बुझे दिमागों में
फिर से उत्साह जगाएँगे।
रोको मत, आगे बढ़ने दो
आजादी के दीवाने हैं,
हम मातृभूमि की सेवा में
अपना सर्वस्व लगाएँगे।
हम उन वीरों के बच्चे हैं
जो धुन के पक्के-सच्चे थे,
हम उनका मान बढायेंगे
हम जग में नाम कमाएँगे।
- रामनरेश त्रिपाठी

ज़बाँ रखता हूँ लेकिन चुप खड़ा हूँ - मोहसिन नक़वी

ज़बाँ रखता हूँ लेकिन चुप खड़ा हूँ

मैं आवाज़ों के बन मैं घिर गया हूँ

मिरे घर का दरीचा पूछता है

मैं सारा दिन कहाँ फिरता रहा हूँ

मुझे मेरे सिवा सब लोग समझें

मैं अपने आप से कम बोलता हूँ

सितारों से हसद की इंतिहा है

मैं क़ब्रों पर चराग़ाँ कर रहा हूँ

सँभल कर अब हवाओं से उलझना

मैं तुझ से पेश-तर बुझने लगा हूँ

मिरी क़ुर्बत से क्यूँ ख़ाइफ़ है दुनिया

समुंदर हूँ मैं ख़ुद में गूँजता हूँ

मुझे कब तक समेटेगा वो 'मोहसिन'

मैं अंदर से बहुत टूटा हुआ हूँ

Thursday, 19 April 2018

रोज़ इक शख़्स चला जाता है ख़्वाहिश करता - राज़ी अख्तर शौक़

रोज़ इक शख़्स चला जाता है ख़्वाहिश करता

अभी आ जाएगा बादल कोई बारिश करता

घर से निकला तो जहाँ-ज़ाद ख़ुदा इतने थे

मैं अना-ज़ाद भी किस किस की परस्तिश करता

हम तो हर लफ़्ज़ में जानाँ तिरी तस्वीर हुए

इस तरह कौन सा आईना सताइश करता

किसी वहशत-ज़दा आसेब की मानिंद हूँ मैं

इक मकाँ में कई नामों से रिहाइश करता

इक न इक दिन तो ये दीवार-ए-क़फ़स गिरनी थी

मैं न करता तो कोई और ये शोरिश करता

अब जो तस्वीर बना ली तो ये धुन और लगी!

कभी देखूँ लब-ए-तस्वीर को जुम्बिश करता

सब अंधेरे में हैं इक अपने मकाँ की ख़ातिर

क्या हवाओं से चराग़ों की सिफ़ारिश करता

और क्या मुझ से तिरी कूज़ा-गरी चाहती है

मैं यहाँ तक तो चला आया हूँ गर्दिश करता

इन ज़मीनों ही पे क्या ख़ोशा-ए-गंदुम के लिए

आसमानों से चला आया हूँ साज़िश करता

             - राज़ी अख्तर शौक़

खुशबुओं का कहाँ ठिकाना है - नीरज निश्चल

 हर तरफ फैलते ही जाना है ।
खुशबुओं का कहाँ ठिकाना है ।

हमसफ़र आप सा मिले जिसको,
उसका तो हर सफर सुहाना है ।

हमने पूछा कि ज़िन्दगी क्या है,
उसने बोला कि मुस्कराना है ।

आपको हर खुशी मुबारक हो,
हर दुआ का यही तराना है ।

किस्सा ए ज़िन्दगी अगर समझो,
कुछ हकीकत है कुछ फ़साना है ।

देख कर जिसको जान जाती है,
ज़िन्दगी का वही बहाना है ।

नीरज निश्चल

सोचा करता हूँ - नीरज निश्चल 

सोचा करता हूँ मै तेरा ओहदा  रब से कम क्या होगा ।
हिज़्र में जब है इतनी लज्जत वस्ल का आलम क्या होगा ।

इश्क के पहलू में तो खिजां भी नूर खिलाती है दिल में,
ये मेरा भगवान ही जाने फूलों का मौसम क्या होगा ।

माना तेरी खबर नहीं कुछ लेकिन मै बेखबर नहीं,
अपना हाल बता देता है हाले हमदम क्या होगा ।

रहकर मुझसे दूर तू साथी मेरे कितने पास भी है,
इस दुनिया मे कोई तुझसा मेरा महरम क्या होगा ।

‘नीरज’ जिसकी राहों में ये लुत्फे जीवन पाया है,
तड़प उठा हूँ सोच के उस मंजिल का संगम क्या होगा ।

नीरज निश्चल

Friday, 13 April 2018

वक्त से हालात से नज़रें मिलाना सीख लो

सतीश बंसल 

वक्त से हालात से नज़रें मिलाना सीख लो
मुश्किलों को साज करके गीत गाना सीख लो

हार जायेगी यकींनन हार इक दिन देखना
हौसला अपना अगर तुम ख़ुद बढा़ना सीख लो

दौर में खुदगर्जियों के ये ज़रूरी है बहुत
तुम भरोसे को सभी के आजमाना सीख लो

इश्क पर पाबंदियाँ हैं बोलना भी है मना
बात दिल की अब निगाहों से बताना सीख लो

चाहते हो फैन लाखों हों तुम्हारे भी अगर
आँख भौहें तुम अदाओं से चलाना सीख लो

चाहिये कद में उँचाई तो करो ये काम तुम
नेकियाँ करते रहो सर को झुकाना सीख लो

कौन होता है किसी के आँसुओं से ग़मज़दा
फायदा बस है इसी में मुस्कुराना सीख लो

सतीश बंसल

तुम्ही तुम

‌‌‍तुम्ही तुम क्यो नजर आते हो
हर पल हर क्षण क्यो सताते हो
ख्वाबो मे तुम दिखते हो
हकिकत में भी सामने आ जाते हो
हर मुश्किल काम आसान बनाते हो
और आसान को भी मुश्किल कर देते हो
कभी बच्चो की तरह रोते हो तो
कभी बड़े बन समझाते हो
खुद रूठते हो खुद मान जाते हो
मुझे मनाने का अवसर ही कहां देते हो
कभी शिकायतें हजार करते हो
कभी तारीफो की पुल बॉध देते हो
शुरूआत तुम्ही करते हो
अंत भी जल्द कर देते हो
मुझे तो बीच मे ही अकेला छोड़ देते हो
कभी चॉद देखने की बात करते हो
कभी मुझमे ही चॉद देखते हो
क्या कहूँ तुझे मैं
तुम्हारी हर अदा निराली है
बस ज्यादा नखरे ना दिखाना
क्योकि अब हमारी बारी हैं।

निवेदिता चतुर्वेदी’निव्या’

गजल - तमन्ना उसकी की है जो कभी हांसिल नहीँ होगा


तमन्ना उसकी की है जो कभी हांसिल नहीँ होगा
कभी कश्ती की बाहों में कोई साहिल नहीं होगा।

जला दूं तुम कहो तो दिल की हर ख्वाहिशें अपनी
मगर फिर भी हमारा दिल तेरे क़ाबिल नहीं होगा।

बहुत समझा लिया है हमने अपने दिलको हमदम
तेरी दुनिया में दोबारा ये दिल शामिल नहीं होगा।

भरोसा कर लिया मैंने लगाया इल्ज़ाम जो तुमने
सफ़ाई दें भी क्या अपनी गवाह हाज़िर नहीँ होगा।

अब चलो हम हार जाते हैं जब हमको हारना ही है
दिल्लगी के खेल में तुमसे बड़ा माहिर नहीं होगा।

हां बड़े अहसान हैं हमपर खुदाया शुक्रिया है तेरा
दर्द ए उल्फत में भी जानिब दिल काफिर नहीँ होगा।

— पावनी

Thursday, 29 March 2018

हमराही - Quote by Ravindra Gangwar

भटकते हैं जो गलियों में जीने के लिए !
वो मुसाफिर नहीं, हमराही हैं !!
धिक्कारते हो तुम जिसे, भूलकर अपनी आवो-हवा !
हकदार इस जहां का उनका ही गुरूर है !!

Wednesday, 28 March 2018

जाम नजरों के - Quote by Ravindra Gangwar

थोड़ा और करीब आओ ना, इश्क करने को जी चाहता है !
तुम जाम अपनी नजरों से पिलाना, मैं थोड़ा और बहक जाऊं !!

ये दुनिया - Quote by Ravindra Gangwar

ये जो दुनिया है ना, कभी-कभी अजीब सी लगती है !
खुश है खुद से, फिर क्यों नाखुश दूसरे से लगती है !!

कहे जो कभी कोई, तो बात तू ना मान उसकी !
है जहर घुला हर मन में, फिर भी कभी साथ तो देती है !!

ख्वाब - Quote by Ravindra Gangwar

ख्वाबों में आकर यूं ही, चले जाना अच्छा था !
ना तड़प दिल की बढ़ाते, आंख चुराना अच्छा था !!

मिली जो इक नज़र तुमसे, भूल गया अपने आप को !
हुआ सवार इश्क की कश्ती में, डूब जाना अच्छा था !!

रास्ते एक हैं हम दोनों के, बस दिशायें बदली हैं !
होगी मुलाकात फिर तुमसे, लौट जाना अच्छा था !!

इस इश्क में मेरे सवाल मैं था, तो जबाव तुम थे !
फिर इस सवाल का, जबाव धूंढ़ लाना अच्छा था !!

खामोशियां - Quote by Ravindra Gangwar

बर्बाद रातों के सिवा, अब कुछ नहीं पास मेरे !
बस खामोशियां हैं, और कुछ सिसकियां !!