Showing posts with label #happiness. Show all posts
Showing posts with label #happiness. Show all posts

Saturday, 28 April 2018

पेड़ के पत्तों में हलचल है ख़बर-दार से हैं - गुलज़ार

पेड़ के पत्तों में हलचल है ख़बर-दार से हैं

शाम से तेज़ हवा चलने के आसार से हैं

नाख़ुदा देख रहा है कि मैं गिर्दाब में हूँ

और जो पुल पे खड़े लोग हैं अख़बार से हैं

चढ़ते सैलाब में साहिल ने तो मुँह ढाँप लिया

लोग पानी का कफ़न लेने को तय्यार से हैं

कल तवारीख़ में दफ़नाए गए थे जो लोग

उन के साए अभी दरवाज़ों पे बेदार से हैं

वक़्त के तीर तो सीने पे सँभाले हम ने

और जो नील पड़े हैं तिरी गुफ़्तार से हैं

रूह से छीले हुए जिस्म जहाँ बिकते हैं

हम को भी बेच दे हम भी उसी बाज़ार से हैं

जब से वो अहल-ए-सियासत में हुए हैं शामिल

कुछ अदू के हैं तो कुछ मेरे तरफ़-दार से हैं

Thursday, 19 April 2018

रोज़ इक शख़्स चला जाता है ख़्वाहिश करता - राज़ी अख्तर शौक़

रोज़ इक शख़्स चला जाता है ख़्वाहिश करता

अभी आ जाएगा बादल कोई बारिश करता

घर से निकला तो जहाँ-ज़ाद ख़ुदा इतने थे

मैं अना-ज़ाद भी किस किस की परस्तिश करता

हम तो हर लफ़्ज़ में जानाँ तिरी तस्वीर हुए

इस तरह कौन सा आईना सताइश करता

किसी वहशत-ज़दा आसेब की मानिंद हूँ मैं

इक मकाँ में कई नामों से रिहाइश करता

इक न इक दिन तो ये दीवार-ए-क़फ़स गिरनी थी

मैं न करता तो कोई और ये शोरिश करता

अब जो तस्वीर बना ली तो ये धुन और लगी!

कभी देखूँ लब-ए-तस्वीर को जुम्बिश करता

सब अंधेरे में हैं इक अपने मकाँ की ख़ातिर

क्या हवाओं से चराग़ों की सिफ़ारिश करता

और क्या मुझ से तिरी कूज़ा-गरी चाहती है

मैं यहाँ तक तो चला आया हूँ गर्दिश करता

इन ज़मीनों ही पे क्या ख़ोशा-ए-गंदुम के लिए

आसमानों से चला आया हूँ साज़िश करता

             - राज़ी अख्तर शौक़

Friday, 13 April 2018

वक्त से हालात से नज़रें मिलाना सीख लो

सतीश बंसल 

वक्त से हालात से नज़रें मिलाना सीख लो
मुश्किलों को साज करके गीत गाना सीख लो

हार जायेगी यकींनन हार इक दिन देखना
हौसला अपना अगर तुम ख़ुद बढा़ना सीख लो

दौर में खुदगर्जियों के ये ज़रूरी है बहुत
तुम भरोसे को सभी के आजमाना सीख लो

इश्क पर पाबंदियाँ हैं बोलना भी है मना
बात दिल की अब निगाहों से बताना सीख लो

चाहते हो फैन लाखों हों तुम्हारे भी अगर
आँख भौहें तुम अदाओं से चलाना सीख लो

चाहिये कद में उँचाई तो करो ये काम तुम
नेकियाँ करते रहो सर को झुकाना सीख लो

कौन होता है किसी के आँसुओं से ग़मज़दा
फायदा बस है इसी में मुस्कुराना सीख लो

सतीश बंसल

गजल - तमन्ना उसकी की है जो कभी हांसिल नहीँ होगा


तमन्ना उसकी की है जो कभी हांसिल नहीँ होगा
कभी कश्ती की बाहों में कोई साहिल नहीं होगा।

जला दूं तुम कहो तो दिल की हर ख्वाहिशें अपनी
मगर फिर भी हमारा दिल तेरे क़ाबिल नहीं होगा।

बहुत समझा लिया है हमने अपने दिलको हमदम
तेरी दुनिया में दोबारा ये दिल शामिल नहीं होगा।

भरोसा कर लिया मैंने लगाया इल्ज़ाम जो तुमने
सफ़ाई दें भी क्या अपनी गवाह हाज़िर नहीँ होगा।

अब चलो हम हार जाते हैं जब हमको हारना ही है
दिल्लगी के खेल में तुमसे बड़ा माहिर नहीं होगा।

हां बड़े अहसान हैं हमपर खुदाया शुक्रिया है तेरा
दर्द ए उल्फत में भी जानिब दिल काफिर नहीँ होगा।

— पावनी

Tuesday, 3 April 2018

ग़ज़ल - रंगमंच की डोर


रंममंच की डोर खिंची तो, नाम सभी बदनाम मिले,
कुछ झंडों में छिपे हुए कुछ सिक्कों में नीलाम मिले।

थाम के उँगली हमने जिनकी, ईश्वर को पाना चाहा
उनके चर्चे, गली-गली में, कौड़ी-कौड़ी दाम मिले।

वतनफरोशों की आँखों में, झाँक रूह भी काँप उठी
एक तिरंगे के टुकड़े में, लिपटे रहमत-राम मिले।

प्यार-मोहब्बत,भाई-चारे की महँगी दुकानों पर
बड़े ही सस्ते खूनी खंजर नफरत के पैगाम मिले।

भक्त समझकर जब जा पहुँचे ,बहुरुपियों की बस्ती में
कंठीमाला हाथ में थामे , सौ-सौ आसाराम मिले।

नमकहलाली क्या होती है, उन्हें सिखाना बड़ा कठिन
जहाँ विभीषण की सूरत में, व्यक्ति नमकहराम मिले।

घर, मरघट को समझ के हमने, भूल बड़ी नादानी की
यहाँ ‘शरद’ से जानेवाले कहते ‘सत्य हैं राम’ मिले।

— शरद सुनेरी

Thursday, 29 March 2018

Love - Quote by Ravindra Gangwar

"Love is not the only thing on my mind. I have other woes...."

हमराही - Quote by Ravindra Gangwar

भटकते हैं जो गलियों में जीने के लिए !
वो मुसाफिर नहीं, हमराही हैं !!
धिक्कारते हो तुम जिसे, भूलकर अपनी आवो-हवा !
हकदार इस जहां का उनका ही गुरूर है !!

Wednesday, 28 March 2018

ये दुनिया - Quote by Ravindra Gangwar

ये जो दुनिया है ना, कभी-कभी अजीब सी लगती है !
खुश है खुद से, फिर क्यों नाखुश दूसरे से लगती है !!

कहे जो कभी कोई, तो बात तू ना मान उसकी !
है जहर घुला हर मन में, फिर भी कभी साथ तो देती है !!

Tuesday, 27 March 2018

Thursday, 9 November 2017

*पायल - एक प्रेम कहानी*

*पायल - एक प्रेम कहानी*

सर्दी हल्की दस्तक दे चुकी थी। खिड़की से आ रही ठंडी हवाओं के झोंके मन को छुए जा रहे थे। अभी मैं कॉफ़ी पीने के लिए अपने कमरे में बैठा ही था कि मेरी नज़र पास रखी अपनी डायरी पर पड़ी। ना जाने क्यों मेरा दिल उस डायरी की तरफ़ खिंचता चला गया।

हाथों में डायरी लिए धीरे-धीरे मैं उसके पन्ने पलटने लगा। कभी कोई बात बड़े चाव से पढ़ता, तो कभी कोई चीज़ पढ़कर ज़ोर से हँसने लगता। तभी अगले पन्ने के बीच एक सालों पुरानी चिट्ठी मेरे आँखों के सामने थी। उसे देख दिल एकदम ठहर-सा गया। इस चिट्ठी को देख फिर से मैं बनारस की यादों में खोने लगा और उन्हीं यादों में हँसती मुस्कुराती पायल, एकदम से मेरे दिलो-दिमाग पर छाने लगी।

पायल से मेरी पहली मुलाक़ात बनारस के घाटों पर हुई थी। उस समय मैं नया-नया बनारस आया था। बचपन से ही मुझे घूमने का बड़ा शौक था तो आते ही पहुँच गया घाट घूमने। बैकग्राउंड में बजता भजन, चेहरे को चूमती हल्की-हल्की हवा और साथ में गंगा मइया; मुझे और क्या चाहिए था। मैं घाट के सीढ़ियों पर बैठे-बैठे आनंदित हुए जा रहा था। तभी मैंने सोचा नाव पर बैठ उस पार भी जाकर थोड़ा घूम लूँ। तो बस झट से किनारे लगी नाव पर बैठ गया।

थोड़ी देर बाद जब नाव पूरी भर गयी तो चल पड़ी। आहिस्ते-आहिस्ते मन रोमांचित हुए जा रहा था। मैं इतना खुश था कि पानी को अपने हाथों से सहलाए जा रहा था। तभी मेरी नज़र सामने बैठी एक लड़की पर पड़ी। वो मुझे देख मुस्कुराए जा रही थी।

मैंने झट से पानी में से हाथ खींच लिया और इधर-उधर देखने लगा। चोर नज़रों से मैंने फिर से उस लड़की को देखा, देखने में तो इतनी सुन्दर थी कि एक बार में ही देखकर प्यार हो जाए, पर कम्बख़्त, अभी भी वो मुझे देख बेपरवाह मुस्कुराए जा रही थी।

मुझे कुछ शक़ हुआ। मैंने अपनी तिरछी नजरों से खुद को टटोला। तभी मैंने पाया कि मेरी पैंट की ज़िप खुली हुई थी। मैं एकदम शर्म से लाल हो गया, फ़ौरन ही किसी तरह नज़र बचाकर उसे बंद किया। कम्बख़्त, आज बीच पानी में मेरी इज़्ज़त पानी-पानी हो चुकी थी। उस लड़की पर गुस्सा भी आ रहा था, साथ ही ना जाने क्यों उसकी मुस्कराहट दिल को पसंद भी आ गई थी। नाव उस किनारे लगते ही मैं उतरकर घूमने लगा। तभी किसी ने पीछे से आवाज दी 'सुनो!' मैंने मुड़कर देखा तो वही लड़की थी।

उसने बिना कुछ और बोले झट से 'सॉरी' बोल दिया।

"कोई बात नहीं, कम्बख़्त, आजकल हर चीज मेरी खुली ही रह रही है," मैंने अपनी शर्ट के बटन बंद करते हुए कहा।

वो खिलखिला पड़ी और बोली "फिर भी, मुझे हँसना नहीं चाहिए था।"

तभी मैं फटाक से बोल पड़ा "इसी बहाने आप मुस्कुराई तो, और आप मुस्कुराते हुए अच्छी लगती हो।"

वो कुछ देर तक एकटक मुझे देखने लगी। मैंने पूछा, "क्या हुआ?" वो कुछ नहीं बोली, पर उसके होंठों पर हल्की मुस्कुराहट फैल गई।

लौटते समय थोड़ा अंधेरा हो चुका था। नाव पर सिर्फ़ चार लोग थे; एक नवविवाहित जोड़ा और हम दोनों। वो मेरे ही बगल में आकर बैठ गई। नाव धीरे-धीरे चल पड़ी। कुछ देर बाद नाव थोड़ी हिचकोले खाने लगी। मैं अभी कुछ समझ पाता कि उसने मेरे हाथों को पकड़ लिया। उन नर्म हाथों के स्पर्श ने मेरे रोम-रोम को रोमांचित-सा कर दिया। मैं उसकी तरफ देखने लगा, वो अभी भी मुस्कुरा रही थी। मैंने बड़े प्यार से कहा "तुम मुस्कुरा क्यों रही हो? कहीं फिर से कुछ खुला रह गया क्या?" वो खिलखिला कर हँसने लगी, बोली "नहीं, बस यूं ही। तुमने ही बोला था ना कि मैं मुस्कुराते हुए अच्छी लगती हूँ," इतना कहकर उसने अपना सिर मेरे कंधों पर रख दिया।

मैं इस नए एहसास में खोता जा रहा था। दिल में नए जज़्बात करवट ले रहे थे। धड़कनें पहली बार सीने में शोर मचा रहीं थी। समझ नहीं पा रहा था कि ये हक़ीक़त है या कोई ख़ूबसूरत सपना। परन्तु जो भी था, वो पल कल्पना से परे था।

हवाएँ उसकी ज़ुल्फ़ों से अठखेलियाँ कर रही थी और मैं बस उनमें खोता जा रहा था। तभी नाविक की "उतर जा, भैया" की आवाज़ ने मुझे डरा-सा दिया। हम दोनों नाव से उतरकर घाट की सीढ़ियों से गुज़रते हुए ऊपर जा पहुँचे।

अभी भी उसका हाथ मेरे हाथों में ही था। तभी उसने कहा "चलो! रबड़ी खाते हैं। उस दुकान पर यहाँ की सबसे अच्छी रबड़ी मिलती है," मैंने भी हामी भर दी। खाते-खाते हम दोनों अपनी बातें साझा करने लगे। उसका नाम 'पायल' था। बिल्कुल अपने नाम की तरह वो जहाँ से गुज़रती, खुशियों की आहट आसपास गूँज पड़ती।

पूछने पर बताया कि वो यहीं की थी। घर बनारस ही था। वो बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती थी और बाक़ी समय में सिलाई और घर के कामों में माँ के साथ हाथ बँटाती थी। आज रविवार था, इसलिए फ़ुरसत में घूमने चली आई थी। कुछ देर और बात करने के बाद उसने कहा "अच्छा! चलती हूँ। माँ देर से घर पहुँचने पर गुस्सा करेगी।"

मैंने उसका हाथ पकड़ते हुए पूछा "फिर कब मिलेंगे?"

वो बिना कुछ बोले जाने लगी। आगे कुछ दूर बढ़कर उसने मुड़कर मुस्कुराते हुए कहा "अगले रविवार को, यहीं पर। और हाँ! अगली बार कुछ खुला नहीं रहना चाहिए," ये सुनकर मैं ज़ोर से हँस पड़ा।

अब हर रविवार का मैं बेसब्री से इंतज़ार करने लगा। उस दिन हम वहीं घाट पर मिलते, नाव में घूमते, रबड़ी खाते, और कभी-कभी पान भी। उसे पान खाते देख, मेरी हँसी मानो रुकती ही नहीं। पान मुँह में भरे जब बात करती तो और प्यारी लगती।

मैं पूछता "तुम्हारी माँ कुछ बोलती नहीं, पान खाने को लेकर?" तो बोलती "बनारस में रहकर पान से बैर? ना बाबा ना!"

वो हरदम पूछती "कितना प्यार करते हो हमसे?" और हर बार मैं बिना कुछ बोले उसे अपनी बाँहों में ज़ोर से भर लेता, फिर वो चुप हो जाती। कुछ देर बाद वो अपने घर लौट जाती और मैं अपने रूम। उसके साथ बिताए उन तीन घंटों को याद कर मैं हर दिन ख़ुश रहा करता था।

उसके साथ कब एक साल गुजर गया, पता तक ना चला। कुछ दिनों में मैं घर जाने वाला था। कॉलेज में दो महीने की छुट्टी होने वाली थी। एक साल बाद मेरी पढ़ाई भी पूरी होने वाली थी, और शायद नौकरी भी पक्की थी। इसलिए मैंने अपने और पायल के प्यार को शादी के बंधन में बाँधने का ठान लिया था। सोमवार की सुबह ही मेरी ट्रेन थी, तो मैंने सोचा इस रविवार जब वो आएगी, तब दिल की हर बात उससे बोल दूँगा।

रविवार आते ही मैं वहाँ पहुँच गया। आज घर जाने के पहले उसे जी भर के देखना चाहता था। बाँहों में भर बेइंतेहा मोहब्बत करना चाहता था। घाट पर से जो भी लड़की गुजरती, उनमें मैं उसे ही तलाश करता। पर वो आज कहीं दिख नहीं रही थी। शाम धीरे-धीरे ढल गई, पर वो नहीं आई। हल्की रोशनी में घाट किनारे बैठ सोचता रहा, आख़िर वो आज क्यों नहीं आई? मन में कई सवाल दस्तक दे रहे थे। पर फिर मैंने सोचा दो महीने की तो बात है, आकर भी तो बोल सकता हूँ। यही सोचकर मैं वहाँ से निकल पड़ा।

अगले दिन सुबह मैं ट्रेन पकड़ वापस घर के लिए निकल पड़ा। घर जाकर अच्छा लग रहा था, पर पायल की कमी भी बहुत महसूस हो रही थी। जैसे ही मेरा कॉलेज खुला, मैं फ़ौरन बनारस पहुँच गया।

रविवार के दिन फिर से मैं वहीं उसका इंतजार कर रहा था। पर आज भी वो नहीं आई। तभी मुझे याद आया, घर जाने से पहले एकबार जब मैंने अपने रूम का पता उसे दिया था, उसी दिन उसने भी अपने घर का पता दिया था। बोली थी "जब रविवार के बाद भी मन ना भरे तो आ जाना, दिख जाऊँगी इस गली के नीले मकान में, फिर बताना कितना प्यार करते हो हमसे?"

मैं पर्स से वो पता निकाल कर दौड़ पड़ा। पता नहीं क्यों आज उसे देखने की बेसब्री बढ़ चुकी थी। मैं बैचेन-सा दौड़े जा रहा था। साँसे फूल रहीं थी पर कदम रोके नहीं रुक रहे थे। मैं जैसे ही उस गली में पहुँचा, मुझे कुछ अटपटा-सा लगा। हर घर के बाहर अधनंगे कपड़ों में कुछ औरतें और कुछ लड़कियाँ बैठी हुई थी। इशारों से मुझे बुलाने की कोशिश कर रही थी।

मैं एकदम परेशान-सा हो गया। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था, तभी वो नीला मकान मुझे दिखा। मैं फ़ौरन उसकी तरफ़ दौड़ पड़ा। नीले मकान के पास बैठी एक अधेड़ उम्र की औरत से जब मैंने पायल के बारे में पूछा तो उसने कहा "पायल से लेकर यहाँ सपना, स्वीटी, झुमकी सब मिलेगी। तू बता, पैसा कितना है तेरे पास, चिकने? उस हिसाब से मैं तय करती हूँ," मेरे पाँव तले जमीन खिसक चुकी थी।
मैं वहाँ से पागलों की तरह भागा। भागते-भागते मैं सोचे जा रहा था, कहीं ये बुरा सपना तो नहीं है। आँखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था। रूम पर पहुँचते ही मैं दरवाज़ा बंद कर बदहवास-सा लेट गया। तभी दरवाज़े से सटे कोने में धूल से लिपटी हुई एक चिट्ठी दिखी। शायद मेरे जाने के बाद दरवाज़े के नीचे से किसी ने डालकर छोड़ दिया था। मैं फ़ौरन उसे झाड़कर खोलने लगा, तारीख़ देखी तो लगभग दो महीने पुरानी थी। चिट्ठी खोलते ही मुझे पायल का नाम दिखा, मैं दिल में मचे इस तूफ़ान के साथ उस चिट्ठी को पढ़ने लगा,

"राहुल,

जब मैं तुमसे पहली बार मिली, तब ही मैं तुम्हें बताना चाहती थी कि मैं कौन हूँ। पर कभी सच नहीं बता पाई। अपनी ज़ुबां से तुम्हें ये सब बताने की हिम्मत नहीं हुई कभी। इसलिए मैंने अपने घर का पता तुम्हें दिया था। शायद अब तक तुम्हें मेरा सच मालूम भी हो चुका होगा। पर पता है जब तुमने हमारी पहली मुलाकात के दिन मुझसे कहा कि मैं मुस्कुराते हुए अच्छी लगती हूँ, तब पहली बार लगा कि जैसे किसी ने मेरी ख़ूबसूरती की तारीफ़ की है। नहीं तो लोग बस मेरे जिस्म की तरफ़ हवस की नज़रों से ही देखते थे।

पहली बार मुझे ख़ुद के ख़ूबसूरत होने का एहसास हुआ था। पहली बार किसी की आँखों में अपने लिए इज़्ज़त और प्यार दिखा। जब भी तुमसे मिलती, मैं ये भूल-सी जाती थी कि मैं एक वेश्या हूँ, जो चंद रुपयों के लिए अपने जिस्म को किसी भी ग़ैर मर्द के हाथों में सौंप देती है।

करती भी क्या? बाबूजी बचपन में ही चल बसे थे और पिछले तीन सालों से मेरी माँ अस्पताल में भर्ती थीं। रोज़ इतना पैसा मैं कहाँ से लाती? ऊपर से दो बहनों की पढ़ाई का खर्चा कहाँ से जुटाती?

अपने जिस्म की कुर्बानी देने के सिवा मेरे पास और कोई चारा नहीं था। पर इस रविवार मेरी माँ चल बसी। मैं अपनी बहनों को लेकर अब इलाहाबाद जा रही हूँ। वहीं रहकर इनकी परवरिश करूँगी। मुझे ढूँढने की कोशिश मत करना। तुमसे इतने दिनों तक झूठ बोलने के बाद मैं ख़ुद को कभी माफ़ नहीं कर पाऊँगी। हो सके तो मुझे माफ़ कर देना।

तुम्हारे साथ बिताए वो हर रविवार के तीन घंटे मैं ज़िंदग़ी भर भूल नहीं पाऊँगी। तुम्हारा वो सच्चा प्यार मुझे ज़िंदग़ी भर याद रहेगा। तुमसे बिछड़ने का ग़म तुमसे ज़्यादा मुझे हो रहा है। पर अपने इतने बड़े सच को तुमसे छिपाकर अपनी नज़रों में ही मैं गिर चुकी हूँ। मैं भी दिल से लाचार हो चुकी थी। तुमसे बेहद प्यार करने लगी थी मैं। जब भी मैं तुमसे पूछती "कितना प्यार करते हो हमसे?" तो तुम अपनी बाँहों में मुझे भर लेते।

सच कहूँ तो मैं हर दिन सोचती कि आज अपनी सच्चाई तुम्हें बता दूँगी, पर उन बाँहों के घेरे को मैं खोना भी नहीं चाहती थी। कहीं तुम मेरा सच जान मुझे छोड़ ना दो, इसी वजह से अपनी सच्चाई छिपाती रही। अब हिम्मत नहीं है तुम्हारे सामने आने की। तुम हमेशा खुश रहो, मैं भगवान से दुआ करूँगी।

मुझे भूल जाना। मैं तुम्हारे क़ाबिल नहीं हूँ।

और अपना ख़्याल रखना,

तुम्हारी,
'पायल'

ख़त पढ़ते-पढ़ते आँसुओं से मैं भीग चुका था। उसे याद कर रोए जा रहा था। इस कड़वे सच को मैं हज़म नहीं कर पाया था। पर अभी भी मेरे दिल में उसके लिए वही इज़्ज़त थी। मैं उसे अब भी पागलों की तरह चाहता था।

कुछ दिन बाद मैं इलाहाबाद भी गया, पर बिना उसके आशियाने का पता जाने उसे कैसे ढूँढ़ता। लाख कोशिशों के बाद भी वो नहीं मिली। भारी दिल और नम आँखों के साथ मैं बनारस लौट आया। अब घाट भी जाना लगभग बंद ही कर दिया। जब भी रविवार आता, एक उदासी मुझे घेर लेती। उसके साथ बिताए पलों को याद कर कभी रात की ख़ामोशी में मुस्कुराते-मुस्कुराते रो पड़ता।

और आज फिर से इस ख़त को पढ़ मैं रोए जा रहा हूँ। चलो! अब ये डायरी भी बंद कर देता हूँ और ये ख़त भी। अपने टूटे दिल के टुकड़ों को समेट अब सो जाता हूँ। आज रविवार है, वो आती ही होगी। अब उससे मुलाक़ात हमारी सपने में ही होती है। हम रबड़ी भी खाते हैं और पान भी। दिल चाहता है ताउम्र इसी नींद में रहूँ। उसका साथ छोड़ने का दिल नहीं करता। पर सपने शायद टूटने के लिए ही बने होते हैं, सपनों में ज़्यादा देर ठहरा नहीं जाता।

'गुड नाईट'

~

Monday, 30 October 2017

Ravindra Gangwar quote

The biggest enemy of success is "Fear of failure" So when FEAR knocks at your DOOR, send COURAGE to open the DOOR and success will wait for you.