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Friday, 18 May 2018

वर्षा

तुरंत ही बारिश बंद हुई है। खिड़की से बाहर की ओर झांका तो हर चीज बारिश के पानी से धुली, नहाई, साफ-सुथरी नजर आने लगी। मेघ की बाल्टियां उड़ेल कर आसमान भी जैसे कुछ धुली हुई-सी नीली फितरत में आ गया हो। आम के पेड़ के गहरे हरे रंग में पानी की बौछारों ने कुछ ताजगी-सी भर दी। अमरूद के पेड़ों की हल्के हरे रंग की पत्तियां जैसे अभी-अभी खिली हों। लीची के नन्हे-से हरे फल धुल कर चमकने लगे। इधर-उधर बेसबब उगी जंगली घास भी खिलखिलाने लगी। तपती गरमी से राहत पाकर चिड़िया का संसार भी ज्यादा चहकने लगा। जाने कौन-सा पंछी है जो कांपते हुए सुरों में लंबी तान देता है। रह-रह कर गूंजती आवाज जैसे उसकी आत्मा की पुकार हो। अभी वह सहमा-सा अपने घोंसले में छिपा बैठा रहा होगा, जब बादल गरज कर धरतीवासियों को डरा रहे थे। बिजली चमक कर उन्हें उनके तुच्छ होने का अहसास करा रही थी। बादल वर्षा कर तृप्त हो गए तो धरती के प्राणी गुंजायमान हो उठे। जैसे मेरा थका मन भी कुछ हरा-हरा-सा हो गया। कुदरत के बीच रहते हुए जीवन कितना जुदा होता है! खिड़की से झांकें तो पेड़-पौधे मुस्कराते हुए मिलते हैं। घर से बाहर निकलें तो वे हमें कुदरत की अनूठी छटा का अहसास कराते हैं। तितलियां देखने के लिए हमें किसी थ्री-डी फिल्म की जरूरत नहीं। बस हम अपने किसी काम में मगन हों और तितलियों का जोड़ा ठीक हमारी नाक के सामने से अपने नन्हें परों को हिलाता हुआ निकल जाए। छोटे बच्चों के पास चिड़ियों से भरा हुआ घर-आंगन हो और चिड़िया देख वे खुश होकर बोलें- ‘आ चिया, आ चिया।’ मेरे साथ दरअसल ऐसा होता है। शाम का समय किसी ऊंघती हुई बालकनी पर नहीं बीतता। न ही मोबाइल में इयरफोन लगाकर बोरियत तोड़ने की जरूरत महसूस होती है। कुछ न कर बस देखें भी, तो इधर एक डाल पर चिड़िया उड़ी, उधर दूसरी डाल पर दूसरी चिड़िया आ बैठी। सबसे अच्छा तो तोतों के झुंड को देख कर लगता है। आम के पेड़ की शाखें अमियों से झुकी हुई हैं। तोतों के झुंड को उनकी पसंद की सारी चीजें मिली हुई हैं।

अब यह बात मुहावरे वाली नहीं लगती कि कौवा कांव-कांव करेगा तो कोई मेहमान आता है। ऊंची-ऊंची कई मंजिला इमारतों वाले शहर में कौवों की कांव-कांव भी नहीं सुनाई देती। केवल कबूतरों की गुटरगूं रहती है। तो अब जब कौवा कांव-कांव करता है तो लगता है कि कोई मेहमान तो नहीं आने वाला। फिर गिलहरियों को देखने का भी अपना लुत्फ होता है। एक पेड़ से उतरती है, दूसरे पेड़ पर सर्र से चढ़ जाती है। आगे के दो छोटे पांवों में पकड़ कर जब कुछ खा रही होती है तो लगता है कि इससे मासूम दुनिया में कोई और नहीं। इसकी मासूमियत पर उधर पड़ोस वाली बिल्ली की नजर हमेशा लगी रहती है। वह अक्सर ढलती शाम में शिकार पर निकलती है, ताकि लोग उसे न भगाएं। शायद उसका शिकार भी अंधेरे में बिल्ली को ठीक से न देख पाए। बिल्ली मौके का फायदा उठा कर हवा में छलांग लगाती है और एक ‘विकेट’ गिर जाता है! एक बदमाश चिड़ियों का झुंड भी है। जब अपने आसपास की दुनिया को ध्यान से देखने में मगन हों तो वे हल्ला मचाती किसी पेड़ की डाल पर उतरती हैं। अपने पंखों से जैसे आसमान की चादर खींच कर पेड़ के ऊपर चांदनी की तरह डाल देती हों। या फिर छत पर छापा मार देती हैं या फिर गाड़ी की छत पर ही। इनकी चहचहाहट इतनी तेज होती है और ये इतनी तेजी से अपने पंख झाड़ती रहती हैं कि इन्हें बदमाश चिड़ियों का झुंड कहना गलत नहीं लगता। इधर-उधर खाने-पीने की चीजें चुगने के बाद वे फुर्र हो जाती हैं।

छोटे बच्चों को मिट्टी से खेलना बहुत अच्छा लगता है। वे नन्हे हाथों से मिट्टी उठाते हैं और वापस डाल देते हैं। बस जब वे दौड़ लगाते हैं तो छोटी-छोटी क्यारियों में सूख चुके लहसुन-प्याज के कुचले जाने का डर सताता है। बच्चे भी कोशिश करते हैं कि उनके पांव क्यारियों में न पड़ कर छोटी-छोटी पगडंडियों पर पड़ें। टमाटर अभी लाल और बड़े होने का इंतजार कर रहे हैं। बच्चे इनकी तरफ आकर्षित होते हैं। हम तो नंगे पांव फर्श पर पैर रखने को तैयार नहीं होते और ये बच्चे नंगे पांव ही घरों में बनी छोटी क्यारियों, जंगली घासों के ऊपर दौड़ लगाते हैं। फर्श पर नंगे पांव चलना ज्यादा मुश्किल है, घास-मिट्टी में नहीं। बारिश के बाद दूर से झिलमिलाती पहाड़ियां भी ज्यादा हरी-भरी सी लगने लगी हैं। बारिश जैसे धूल भरी तस्वीरों की मिट्टी झाड़ देती हो। पेड़ों का मन खुश कर देती हो। पंछियों को तर कर देती हो। यही बारिश ज्यादा होती है तो डर भी लगता है। डर भी अपनी जगह सही है। फिर जब धूप आएगी तो सारी नमी को सुखा देगी। जैसे कम्प्यूटर पर ‘रिफ्रेश’ का बटन दबाते हैं, कुदरत भी बारिश के जरिए सब कुछ ‘रिफ्रेश’ कर देती है। हमें जिंदगी की ओर लौटना है तो कुदरत की ओर लौटना होगा। कुदरत के साथ कुछ समय बिताना होगा।

Saturday, 28 April 2018

पेड़ के पत्तों में हलचल है ख़बर-दार से हैं - गुलज़ार

पेड़ के पत्तों में हलचल है ख़बर-दार से हैं

शाम से तेज़ हवा चलने के आसार से हैं

नाख़ुदा देख रहा है कि मैं गिर्दाब में हूँ

और जो पुल पे खड़े लोग हैं अख़बार से हैं

चढ़ते सैलाब में साहिल ने तो मुँह ढाँप लिया

लोग पानी का कफ़न लेने को तय्यार से हैं

कल तवारीख़ में दफ़नाए गए थे जो लोग

उन के साए अभी दरवाज़ों पे बेदार से हैं

वक़्त के तीर तो सीने पे सँभाले हम ने

और जो नील पड़े हैं तिरी गुफ़्तार से हैं

रूह से छीले हुए जिस्म जहाँ बिकते हैं

हम को भी बेच दे हम भी उसी बाज़ार से हैं

जब से वो अहल-ए-सियासत में हुए हैं शामिल

कुछ अदू के हैं तो कुछ मेरे तरफ़-दार से हैं

Wednesday, 25 April 2018

कर्ब चेहरों पे सजाते हुए मर जाते हैं - मालिकज़ादा जावेद

कर्ब चेहरों पे सजाते हुए मर जाते हैं

हम वतन छोड़ के जाते हुए मर जाते हैं

ज़िंदगी एक कहानी के सिवा कुछ भी नहीं

लोग किरदार निभाते हुए मर जाते हैं

उम्र-भर जिन को मयस्सर नहीं होती मंज़िल

ख़ाक राहों में उड़ाते हुए मर जाते हैं

कुछ परिंदे हैं जो सूखे हुए दरियाओं से

इल्म की प्यास बुझाते हुए मर जाते हैं

ज़िंदा रहते हैं कई लोग मुसाफ़िर की तरह

जो सफ़र में कहीं जाते हुए मर जाते हैं

उन का पैग़ाम मिला करता है ग़ैरों से मुझे

वो मिरे पास ख़ुद आते हुए मर जाते हैं

जिन को अपनों से तवज्जोह नहीं मिलती 'जावेद'

हाथ ग़ैरों से मिलाते हुए मर जाते हैं

Tuesday, 24 April 2018

दिल में नफरत थी मुहब्बत ही सजा ली हमने - कुमार अरविन्द

 रोग जाता ही नहीं कितनी दवा ली हमने
माँ के क़दमों में झुके और दुआ ली हमने
इस ज़माने ने सताया भी बहुत है मुझको
आग ये सीने की अश्कों से बुझा ली हमने
जब नजर आई नहीं ख्वाब में माँ की सूरत
अपनी आंखों से हर इक नींद हटा ली हमनें
देखने तो आज सभी आये तमाशा मेरा
जब से दीवार घरों में ही उठा ली हमने
तेरी चाहत में हुआ है हाल दिवानों जैसा
अपनी पगड़ी ही सरे आम उछाली हमनें
हर तरफ ही यूं नजर आने लगी उल्फ़त जब
दिल में नफरत थी मुहब्बत ही सजा ली हमने
खत्म हो जाये न ये दौर मुलाकातों का
ज़िंदगी बस तेरे वादे पे बिता दी हमने
माँ के क़दमों में ये सारा ही जहां दिखता है
बस तेरी याद में हस्ती भी मिटा ली हमने
खौफ था मुझको चरागों से ही घर जलने का
आग ‘अरविन्द’ घरों में ही लगा ली हमने

— कुमार अरविन्द

बातें ही बातें हैं...भगवती प्रसाद व्यास 'नीरद'

चाहत मेरी पहचानता नहीं ,
दिल की बातें वह जानता नहीं !!

फूलों की माला है चुनी बुनी ,
बांध चुके गांठें मानता नहीं !!

आंखों में नींदों की खता कहां ,
आस चढ़ी सूली जानता नहीं !!

अलकें हैं काली सी घटा यहां ,
भीगें हम दोनों मानता नही !!

बातें ही बातें हैं अदा कभी ,
सब कुछ पायेगा मानता नहीं !!

अपनों ने अकसर दी सज़ा यहां ,
गैरों के दिल की जानता नहीं !!

खुशबू को बांधा है यदा कदा ,
वक़्त ठहर जाये ठानता नहीं !!

हमने तो बुन डाले सपन कई ,
पल ने जो ठानी मानता नहीं !!

दुनिया में मतवाला दिखे वही ,
सूरत दूजी पहचानता नहीं !!

Monday, 23 April 2018

धुआँ बना के फ़ज़ा में उड़ा दिया मुझ को - नज़ीर बाक़री

धुआँ बना के फ़ज़ा में उड़ा दिया मुझ को

मैं जल रहा था किसी ने बुझा दिया मुझ को

तरक़्क़ियों का फ़साना सुना दिया मुझ को

अभी हँसा भी न था और रुला दिया मुझ को

मैं एक ज़र्रा बुलंदी को छूने निकला था

हवा ने थम के ज़मीं पर गिरा दिया मुझ को

सफ़ेद संग की चादर लपेट कर मुझ पर

फ़सील-ए-शहर पे किस ने सजा दिया मुझ को

खड़ा हूँ आज भी रोटी के चार हर्फ़ लिए

सवाल ये है किताबों ने क्या दिया मुझ को

न जाने कौन सा जज़्बा था जिस ने ख़ुद ही 'नज़ीर'

मिरी ही ज़ात का दुश्मन बना दिया मुझ को

हिज्र के काँच चुभे है हाथ की लकीरों में...सुरिंदर कौर


हिज्र के काँच चुभे है हाथ की लकीरों में।
इशक ने बैठा दिया ला कर हमे फकीरों में

ख़ता तो इतनी बड़ी नही, मेरी सैय्याद मेरे।
जकड़ के क्यू रखा है फिर मुझे जंजीरों मे।

ढूँढने से तो सुना है ,खुदा भी मिल जाता है,
लेकिन क्या पता,क्या लिखा है तकदीरों मे।

मेरी हस्ती पे ,गर तेरा करम बना रहे मालिक,
निकाल लूँगी मै राह ,लड़ कर तदबीरों से।

जीना है, तो जिंदगी में करम कर तू ऐ बंदे,
वक्त न ज़ाया कर ,सुनने को तहरीरों में।

सुरिंदर कौर
 

गज़ल - भरत मल्होत्रा


बुरा औरों का जो करता नहीं है
शर्म से उसका सर झुकता नहीं है
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कभी भी आज़मा लो जब जी चाहे
सच्चा आदमी डरता नहीं है
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दुनिया भर की दौलत मिल भी जाए
पेट लालच का पर भरता नहीं है
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नहीं बन पाएगा कुंदन कभी वो
जो अपनी आग में जलता नहीं है
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कहते हैं पते की बात लेकिन
बुज़ुर्गों की कोई सुनता नहीं है
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वफा रखो तुम अपनी पास अपने
ये सिक्का अब यहां चलता नही है
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आभार सहित :- भरत मल्होत्रा।

Sunday, 22 April 2018

“लिख दूँ” - आदित्य पाण्डेय

कलम ख़ामोश है
सोचता हूँ कि लिख दूँ
फ़िर सोचता हूँ कि आख़िर क्या लिख दूँ??

खौफ के दौर में चीखते मासूमों की कहानी लिख दूँ
मज़हबी आड़ में ज़ुर्म-ए-शय से होती हैरानी लिख दूँ
जब अदालतें इंसाफ नहीं, दौलत के लिए खुलती हैं
अस्मतें, घर के बंद दरवाजों, मन्दिरों में लुटती हैं
इन बदलती फिज़ाओं से दिखती इंसानियत की नाकामी लिख दूँ
कलम ख़ामोश है तो सोचता हूँ कि लिख दूँ
फ़िर सोचता हूँ कि आख़िर क्या लिख दूँ

जाति, मज़हब में बंटे मुल्क, फैलती नफ़रत
फ़ना होने को खड़ी कायनात की रवानी लिख दूँ
सियासत के ऊँचे पायदान पर,
ख़ामोश खड़ी है खाकी
चोर, लुटेरों, अमन परस्तों के बदन पर सजी है खादी
दौर-ए- दुश्वारियों से जूझते जिस्मों में फ़िर भी लहू है बाकी
ग़रीब की कमाई से लुटते खजाने की, नाकाम निगरानी लिख दूँ
या लिखूँ फ़िर की बेरोजगारी से बदहाल जवानी लिख दूँ
सच कहूँ..
तो लेखनी ख़फा, लफ्ज़ जुदा जुदा है
कलम एक अर्शे से बस ख़ामोश है
तो सोचता हूँ कि लिख दूँ
फ़िर सोचता हूँ कि
आख़िर क्या
लिख दूँ..

आदित्य पाण्डेय...

ये एक बात समझने में रात हो गई है - तहज़ीब हाफ़ी

ये एक बात समझने में रात हो गई है

मैं उस से जीत गया हूँ कि मात हो गई है

मैं अब के साल परिंदों का दिन मनाऊँगा

मिरी क़रीब के जंगल से बात हो गई है

बिछड़ के तुझ से न ख़ुश रह सकूँगा सोचा था

तिरी जुदाई ही वज्ह-ए-नशात हो गई है

बदन में एक तरफ़ दिन तुलूअ' मैं ने किया

बदन के दूसरे हिस्से में रात हो गई है

मैं जंगलों की तरफ़ चल पड़ा हूँ छोड़ के घर

ये क्या कि घर की उदासी भी साथ हो गई है

रहेगा याद मदीने से वापसी का सफ़र

मैं नज़्म लिखने लगा था कि ना'त हो गई है

न ख़ौफ़-ए-बर्क़ न ख़ौफ़-ए-शरर लगे है मुझे - मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद

न ख़ौफ़-ए-बर्क़ न ख़ौफ़-ए-शरर लगे है मुझे

ख़ुद अपने बाग़ को फूलों से डर लगे है मुझे

अजीब दर्द का रिश्ता है सारी दुनिया में

कहीं हो जलता मकाँ अपना घर लगे है मुझे

मैं एक जाम हूँ किस किस के होंट तक पहुँचूँ

ग़ज़ब की प्यास लिए हर बशर लगे है मुझे

तराश लेता हूँ उस से भी आईने 'मंज़ूर'

किसी के हाथ का पत्थर अगर लगे है मुझे

Saturday, 21 April 2018

ज़बाँ रखता हूँ लेकिन चुप खड़ा हूँ - मोहसिन नक़वी

ज़बाँ रखता हूँ लेकिन चुप खड़ा हूँ

मैं आवाज़ों के बन मैं घिर गया हूँ

मिरे घर का दरीचा पूछता है

मैं सारा दिन कहाँ फिरता रहा हूँ

मुझे मेरे सिवा सब लोग समझें

मैं अपने आप से कम बोलता हूँ

सितारों से हसद की इंतिहा है

मैं क़ब्रों पर चराग़ाँ कर रहा हूँ

सँभल कर अब हवाओं से उलझना

मैं तुझ से पेश-तर बुझने लगा हूँ

मिरी क़ुर्बत से क्यूँ ख़ाइफ़ है दुनिया

समुंदर हूँ मैं ख़ुद में गूँजता हूँ

मुझे कब तक समेटेगा वो 'मोहसिन'

मैं अंदर से बहुत टूटा हुआ हूँ

Friday, 20 April 2018

दिल था कि फिर बहल गया, जाँ थी कि फिर संभल गई!

-त्रिभुवन ||
वह लंदन से पत्र लिख रहा था।
प्रसून भाई, कॉमनवेल्थ हेड्स ऑफ़ गवर्नमेंट मीटिंग (चोगम) सम्मेलन का इस तरह फ़ायदा उठवाने के लिए तुम्हें अपने हृदय तल से कितना साधुवाद दूं! मेरे पास शब्द नहीं हैं। मेरे यार तुमने तो कमाल कर दिया। साला मैं तो कच्ची कैरियों को आम बताकर बेचने में उस्ताद था, तुमने तो यार गुठलियां की गुठलियां ही अल्फ़ांज़ो बताकर टिका दीं! मान गए गुरू!
प्रसून, तुम्हारी वो एक कविता है ना….शर्म आ रही है ना! यार इस वक़्त मुझे बहुत याद आ रही है। लेकिन शीर्षक के बाद ऐसा लगता है कि यह कविता इसी पंक्ति पर ख़त्म हो जानी चाहिए। तुमने वेस्टमिंस्टर के सेंट्रल हॉल से जिस तरह लंदन में बैठे लाेगों के माथे पर तिलक लगवाया और उनके दिमाग़ों का जिस तरह मुरब्बा बनाया, वह कमाल की अदा थी। आैर ये तुम जानते ही हो कि ये सब वे प्रवासी थे, जो अंगरेज़ के वापस चले जाने के बाद हिन्दुस्तान में अपनी रूह को ग़मज़दा देखकर उनके पीछे-पीछे चले गए थे।
मुझे इस वक़्त वो पाकिस्तानी (हां-हां, वह घटिया मुल्क़, जैसा कि तुमने एक सवाल पूछकर साबित भी किया कि हमने कैसे सर्जिकल स्ट्राइक करके क़ीमा बना दिया) शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का शेर याद आ रहा है : शाम-ए-फ़िराक़ अब न पूछ आई और आ के टल गई दिल था कि फिर बहल गया जाँ थी कि फिर सँभल गई! सच में उस्ताद, पैसा तो लगा, लेकिन मज़ा आ गया। ये जो आरिफ़ा-वारिफा, उन्नाव-वुन्नाव, नोटबंदी-ओटबंदी जैसे वाहियात से मामलों के कारण विपक्ष वाले जो हालात ख़राब कर रहे थे ना, उनसे कुछ सांस मिल गई।
सच कहता हूं, कई दिन से साला दिमाग का दही हो रहा था तुमने जैसे बज़्म-ए-ख़याल में हुस्न की शमां सी जला दी। क़माल हो या क़माल। फ़िल्मी गीतकारों के इतिहास में आज तक जो कुछ ग़ुलज़ार और जावेद अख़्तर जैसे लोग सोच भी नहीं पाए, तुमने तो उससे आगे भी नए जहां तलाश लिये। सच में मैकेन एरिकसन ने तुम्हारी प्रतिभा को ठीक ही पहचाना।
प्रसून यार, अपनी तबियत प्रसन्न हो गई। दर्द जितना भी था, चांद बनकर चमक उठा। वो हिज़्र की रातों की सी बेचैनी को तुमने धो-पौंछ दिया। मैं लंदन में सुबह उठा तो हृदय गदगद हो गया। अप्रैल की ये सुहानी सुबह मचल-मचलकर महक-महक कर मुझे बांहों में भर रही थी। तुमने तो मेरे यार सारे हालात ही बदल दिए। आज तो एक नई सुबह थी और नई सबा थी।
वो क़मीना पत्रकार तो इसे ‘अवेक इन लंदन, अनअवेयर इन इंडिया’ नाम देकर मज़ाक उड़ा रहा था, लेकिन तूने प्रसून सारे पैसे वसूल करवा दिए। मैं इतना खुश हूं कि बयान नहीं कर सकता। क्या-क्या बुलवा दिया तुमने मुझसे। मेरी सरकार की ख़ूब आलोचना की जानी चाहिए। आख़िर हम लोकतंत्र में रहते हैं। मैं भी आप जैसा ही आदमी हूं और मुझ में भी वही कमियां हो सकती हैं, जो आप में हैं। क्या रे यार। तूने तो परेश रावल को भी पीछे छोड़ दिया। क्या खूब तो प्लाॅट, क़माल स्टोरी, म्युजिक और शानदार स्क्रीनप्ले! ग़ज़ब बंदे हो यार। कहां तो शेख़ साहब के इक़राम में आज तक जो शय हराम थी, उसी को तुमने राहते-जां बना डाला। तुमने यार जो पब्लिक रिलेशंस की टर्म को जर्नलिज्म और पॉलिटक्स के जिस हॉट डॉग में बदला है ना, वह सच में संजीव कपूर जैसे लोग भी कुछ नहीं कर सकते। हां, इससे याद आया, तुम अब पब्लिक रिलेशंस और पाेएट्री का कोई फ्यूजन करके सैफ्रॉन चिल्ली रेस्टॉरेंट भी चला सकते हो!
प्रसून, तुमने किस तरह सबको एक साथ कैसे-कैसे साधा। मैं तो मन ही मन हंस-हंसकर लोटपाेट हो रहा था कि तुमने एक गुजराती को चूसी हुई गुठली दी और वह आंखों में आंसू भरकर उसे केसर आम समझकर ले गया। और वह तो और भी कमाल था। वो कर्नाटक वाला तो गुठली को तोतापुरी समझकर ही चूसता-चूसता सम्मेलन से बाहर निकला। ये आम की गुठलियों का इतना शानदार प्रयोग तुमने कहां सीखा मित्र? वो हिमाचल वाले को तुमने जैसे ही गुठली दी, मुझे लगा एक बार कि ये तो वॉमिट कर देगा, लेकिन क्या देखता हूं, वह तो चोसा समझकर लपालप चूसने लगा। और यार वो यूपी वाले दोनों बुड्ढ़े तो गुठलियों को ऐसे बटोर ले गए जैसे लंगड़े और दशहरी की ताज़ा कटी फांकें हों। मुझे तो वो बंगाली और महाराष्ट्रियन पर हंसी आ रही है। दोनों भाई गुठलियों को अल्फ़ांजों और हिमसागर समझकर टूट पड़े। वो आंध्र वाला भाई तो बची-खुची गुठलियों को बंगनपल्ली समझकर ही फ़िदा था! यार, प्रसून तुम वाकई में भारत रत्न हो! अगली बार अपनी सरकार आ गई तो अपना ये वादा रहा कि तेरे को भारत-रत्न पक्का! बस तू मेरे लिए इस देश के हर मतदाता को भाग मिल्खा भाग की तरह ईवीएम की तरफ दौड़ाता रह! दोस्त, तू ही है अब। तू मेरी पार्टी के किसी बंदे के दिल को लहू कर या किसी और का, या अपना ही कर, लेकिन मेरा गरेबाँ तो रफ़ू कर!
तुुम्हारा
मैं
…और वहीं कहीं फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ या पता नहीं किसी और की आत्मा भी भटक रही थी। वह गुनगुना रही थी : बिखरी इक बार तो हाथ आई है कब मौज-ए-शमीम, दिल से निकली है तो कब लब पे फ़ुग़ाँ ठहरी है!

Thursday, 19 April 2018

स्मृतियों ने साथ न छोड़ा – आलोक यादव


स्मृतियों ने साथ न छोड़ा

मनबसियों ने साथ न छोड़ा

धुंधले हुए चित्र बचपन के

कौन सुनाए परीकथाएं

ऐसी नींद नहीं आती अब

जिन में फिर वो सपने आएं

पर सपनों में जो आती थीं

उन परियों ने साथ न छोड़ा

जीवन की आपाधापी में

जाने कितने साथी छूटे

जग में मनभावन उपवन के

छूटे कितने ही गुलबूटे

जिन की गंध बसी थी मन में

उन कलियों ने साथ न छोड़ा

यायावर हम निपट अकेले

रह पाए किस घर के हो के

चौखट ऐसी कोई नहीं थी

कर मनुहार हमें जो रोके

पर हम साथ जहां चलते थे

उन गलियों ने साथ न छोड़ा.

– आलोक यादव

Wednesday, 18 April 2018

कविता – दे कोई दुहाई - जयति जैन 'नूतन'

 नयनों की पुकार है

उस आंख वाले को

जो नासमझ बना है

जो निशब्द आगे बढ़ा है।

नजर ना आया जिसे

नयनों का गर्म नीर

नजरअंदाज किया जिसने

चोट खाती हुई पीर।

वेदना के क्षण भूला

आंखों का सपना टूटा

ढलती शाम सा जीवन में

अंधेरों में एक पुष्प खिला।

दे कोई उसे दुहाई

कोई तो एहसास जगे

पायल की झनकार सुने वो

जीवन में श्रृंगार भरे।

Friday, 13 April 2018

वक्त से हालात से नज़रें मिलाना सीख लो

सतीश बंसल 

वक्त से हालात से नज़रें मिलाना सीख लो
मुश्किलों को साज करके गीत गाना सीख लो

हार जायेगी यकींनन हार इक दिन देखना
हौसला अपना अगर तुम ख़ुद बढा़ना सीख लो

दौर में खुदगर्जियों के ये ज़रूरी है बहुत
तुम भरोसे को सभी के आजमाना सीख लो

इश्क पर पाबंदियाँ हैं बोलना भी है मना
बात दिल की अब निगाहों से बताना सीख लो

चाहते हो फैन लाखों हों तुम्हारे भी अगर
आँख भौहें तुम अदाओं से चलाना सीख लो

चाहिये कद में उँचाई तो करो ये काम तुम
नेकियाँ करते रहो सर को झुकाना सीख लो

कौन होता है किसी के आँसुओं से ग़मज़दा
फायदा बस है इसी में मुस्कुराना सीख लो

सतीश बंसल

तुम्ही तुम

‌‌‍तुम्ही तुम क्यो नजर आते हो
हर पल हर क्षण क्यो सताते हो
ख्वाबो मे तुम दिखते हो
हकिकत में भी सामने आ जाते हो
हर मुश्किल काम आसान बनाते हो
और आसान को भी मुश्किल कर देते हो
कभी बच्चो की तरह रोते हो तो
कभी बड़े बन समझाते हो
खुद रूठते हो खुद मान जाते हो
मुझे मनाने का अवसर ही कहां देते हो
कभी शिकायतें हजार करते हो
कभी तारीफो की पुल बॉध देते हो
शुरूआत तुम्ही करते हो
अंत भी जल्द कर देते हो
मुझे तो बीच मे ही अकेला छोड़ देते हो
कभी चॉद देखने की बात करते हो
कभी मुझमे ही चॉद देखते हो
क्या कहूँ तुझे मैं
तुम्हारी हर अदा निराली है
बस ज्यादा नखरे ना दिखाना
क्योकि अब हमारी बारी हैं।

निवेदिता चतुर्वेदी’निव्या’