Wednesday, 4 October 2017

जश्न *भाग-2*

जश्न
    
*भाग-2*

वो दोनों अग्नि के सात फेरे ले रहे थे। आसपास खड़े लोग उन पर फूल बरसा रहे थे। मैं एक कोने में खड़ी जलती हुई नज़रों से उन्हें देख रही थी। अचानक स्वर आग की लपटों से घिर गया। उसकी भावी पत्नी उठकर दूर जाने लगी। मैं स्वर को बचाने के लिए दौड़ी, पर ये क्या, अब मेरे चारों ओर आग का घेरा बना था। स्वर को जलाने वाली आग अब मुझे जला रही थी। मैंने उसकी तरफ़ देखा, वो बिल्कुल ठीक था, पर मैं जले जा रही थी। अंत नज़दीक था।

पसीने से तरबतर मैं बिस्तर पर पड़ी थी। आँख खुलते ही मैं अपने दिमाग की करामात पर हैरान थी। मुझे अक्सर डरावने सपने नहीं आते, लेकिन आज ये सपना, जनवरी की ठंड में मुझे जेठ के महीने का एहसास सा हो रहा था। पलंग के सिरहाने रखे पानी के जग को मैंने अपने मुँह पर उड़ेल लिया। कुछ देर बाद धड़कनें थमने लगीं तो मन के घोड़े फिर से दौड़ने लगे।

क्या मैं सही कर रही हूँ? ख़ुद के साथ, स्वर के साथ, क्या मैं ऐसा करके उसे और मुझे दोनों को ही दु:ख नहीं पहुँचा रही? पर मेरे लिए ये करना ज़रूरी था। जीवन की सच्चाई को अपनी आँखों से देखे बिना स्वीकार करना शायद इतना आसान ना हो। ख़ुद को ही तसल्लियाँ देते-देते ना जाने कब नींद के आगोश में समा गई। आँख खुली तो एक नई सुबह दस्तक दे चुकी थी। कौन जाने ये दिन मेरे लिए क्या लाने वाला था।

********

घर में हर कोई व्यस्त नज़र आ रहा था, कल शादी जो थी। सबसे अलग-थलग मैं एक कोने में बैठी सब देख रही थी। सुबह से शाम कब हुई, पता ही नहीं चला। पूरे दिन स्वर भी कहीं दिखाई नहीं दिया था। रात के सन्नाटे में एक बार फिर मैं अपने विचारों में खोई थी। मोबाइल की आवाज़ सुनकर एहसास हुआ कि मैं कहाँ हूँ।

स्वर का मैसेज था, "छत पर आ जाओ, इंतज़ार कर रहा हूँ।"

रात के ढ़ाई बज रहे थे। इस वक़्त स्वर से मिलना खतरे से खाली नहीं था। अगर कोई हमें देख ले तो बहुत बड़ा हंगामा हो सकता था। मैं इसी कशमकश में पड़ी थी कि जाऊँ या नहीं, तभी फ़ोन बजने लगा। इस बार उसने कॉल किया था।

"मुझे पता है कि तुम जाग रही हो, जल्दी से ऊपर आ जाओ।"

मेरे जवाब देने से पहले ही उसने फ़ोन रख दिया। शॉल ओढ़कर मैं बर्फ़ीली रात में बाहर निकल आई। छत तक का रास्ता बहुत जोख़िम भरा महसूस हुआ। स्वर एक कोने में सिमटा हुआ खड़ा इंतज़ार कर रहा था। मुझे देखते ही उसकी आँखों में चमक आ गई।

"तुमने मैसेज नहीं पढ़ा था क्या?" उसने उत्तर जानते हुए भी पूछा।

"पढ़ लिया था, आने में डर रही थी," मैंने झुकी नज़रों से कहा।

"अच्छा! मेरे घर आने में डर नहीं लगा? छत तक आने में डर रही थी।" उसकी आवाज़ में व्यंग्य था।

"आज तो तुम्हारे लिए डर रही थी। किसी ने हमें ऐसे देख लिया तो तुम्हारे लिए परेशानी खड़ी हो जाएगी," उसकी आँखों में एक अजीब-सी बेचैनी थी।

"और तुम्हारे यहाँ आने से कुछ परेशानी नहीं होगी?" ऐसे वक़्त में भी उसके झगड़ने की क्षमता की मैं क़ायल हो गई।

"मैं ऐसा कुछ नहीं करना चाहती जिससे तुम्हें परेशानी हो।" मैंने उससे हज़ारों बार कही हुई बात फिर से दोहराई।

"वो तो तुम बहुत पहले ही कर चुकी हो, जो मुझे ज़िन्दगी के हर लम्हें सताता रहेगा," उसने डूबती आवाज़ में कहा।

"क्या?" मुझे याद नहीं था कि मैंने ऐसा कुछ किया हो।

"मुझसे प्यार," उसका जवाब सपाट था।

मैं बिना कुछ कहे एकटक उसे देखती रही। कुछ देर के लिए वो भी मंत्रमुग्ध सा मेरी आँखों में देखता रहा।

कुछ सेकण्ड्स बाद उसने ही इस असहज चुप्पी को तोडा, "और इसीलिए मैं तुम्हें वो सारी चीज़ें वापस करना चाहता हूँ जो मुझे तुम्हारी याद दिला पाएँ।"

उसके क़दमों के नीचे एक बॉक्स रखा था। अब भी मेरे मुँह से शब्द नहीं निकल पा रहे थे।

"तुम भी मुझे कुछ वापस देना चाहोगी?" उसने पूछा।

मैंने इनकार में सिर हिला दिया।

"कोई गिला-शिक़वा हो, कुछ कहना हो तो अभी कह सकती हो," उसने फ़िर से कहा।

मेरी ज़ुबान हिलने को तैयार नहीं थी। मैं बस उसे देखे जा रही थी।

"तुम मुझसे लड़ना नहीं चाहती? मैं तुम्हारे साथ इतना सब कुछ कर रहा हूँ," इस बार मेरी आँखों ने उसे 'ना' कहा।

स्वर मेरी बाँहें पकड़ के मुझे झिंझोड़ने लगा। अब तो उसकी बातें भी कानों में नहीं पड़ रही थीं। मुझे बस उसकी आँखें दिखाई दे रही थीं। उसने मुझे अपने सीने से लगा लिया। शायद वो रो रहा था। मैं उसकी बाँहों में बुत बनकर खड़ी थी।

कुछ देर और उसने मुझसे प्रतिक्रिया पाने की कोशिश की पर नाकाम रहा। लेकिन मैं कहाँ थी वहाँ, मैं तो कहीं दूर ख़्यालों में गोते लगा रही थी। मैं तो उन पलों में खोई थी जहाँ वो मेरा हुआ करता था।

थक-हार कर वो मुझे वहीं छोड़कर चला गया। मैं सर्द ज़मीन पर बैठी थी। मेरे सामने वो बॉक्स खुला पड़ा था। हर एक चीज़ और उससे जुड़ी बातें मेरे दिलो-दिमाग पर छाने लगी। वो की-चेन, वो मग, वो पोस्टर, वो बर्थडे कार्ड्स, वो अनगिनत सूखे फूल जो कभी मेरे प्यार की निशानी थे।

एक चिट्ठी पर अचानक एक बूँद गिरी, मुझे एहसास हुआ कि मेरा पूरा चेहरा आँसुओं से भीगा था। मेरी बरबादी मुँह बहाए खड़ी थी और मैं तारों की छाँव में उसका जश्न मना रही थी।

************

सूरज की पहली किरण ने मेरी पलकों को छुआ तो अहसास हुआ कि मैं रातभर स्वर की यादों को सिरहाने से लगाकर छत पर ही सोती रही। नीचे से हलचल की धीमी आवाज़ें आ रही थी। गाँव में वैसे भी दिन जल्दी शुरु हो जाता है और आज तो शादी का दिन था। इतना सोचते ही मेरा दिल डूब गया। बिखरी हुई यादें समेट बॉक्स में भर कर नीचे उतरने लगी।

मन में अस्थिरता होने के कारण हड़बड़ी में सीढ़ियों से मेरा पैर फिसल गया। बॉक्स मेरे हाथ से छूटकर धड़धड़ाता हुआ नीचे जा गिरा। भगवान का शुक्र है कि मुझे खरोंच तक नहीं आई, लेकिन जब तक मैं नीचे पहुँची तो बॉक्स किसी के हाथों में था।

वहाँ पहुँचकर प्रिया को पाया तो मेरी साँस में साँस आई।

“रुशिता तुम! तुम इस वक़्त ऊपर क्या कर रही थी? और ये क्या है?” उसके चेहरे पर हैरानी साफ झलक रही थी।

“कुछ नहीं, बस उगता सूरज देखना चाहती थी इस निर्मल वातावरण में,” मैंने होंठों पर नकली मुस्कान लाते हुए कहा।

“और ये मेरे हाथ से छूट गया था। लाओ, मुझे दो।” बॉक्स लेने के लिए मैंने हाथ आगे बढ़ाया।

“तुम कुछ छुपा रही हो, रुशिता। तुम ठीक तो हो? रात को ढंगसे सोई नहीं क्या, आँखें भी सूज रही हैं। आख़िर बात क्या है?” बॉक्स अब मेरे हाथ में था और हम दोनों मेरे कमरे की तरफ़ जा रहे थे।

स्वर के तोहफ़ों को संभालकर अलमारी में रखने के बाद मैं प्रिया की तरफ़ मुड़ी जो अब पलंग के एक किनारे पर बैठी थी। मेरे चेहरे के भावों को पढ़ने में उसे कुछ तकलीफ हो रही थी। मैं जाकर उसके बगल में बैठ गई।

“देखो रुशिता, मैं जानती हूँ कि ये सब तुम्हारे लिए आसान नहीं है, लेकिन तुमने खुद ये फैसला लिया है। अगर अब तुम खुद को कहीं क़मज़ोर पा रही हो तो यहाँ से चली क्यों नहीं जाती? अपने आप को इस तरह दर्द पहुँचाने का क्या मतलब?” प्रिया ने अपनी समझदारी के हिसाब से मुझे हिदायत देने की कोशिश की।

“प्यार का तो दूसरा नाम ही दर्द है, प्रिया। इससे मुझे कमज़ोरी नहीं बल्कि ताकत मिल रही है।” मैंने साहसी मुस्कान के साथ कहा।

“पता नहीं रुशिता तुम किस मिट्टी की बनी हो! तुम्हारी जगह अगर मैं होती तो या तो उसे मार देती या फिर खुद को ख़त्म कर लेती,” वो अब मुझे अजीब नज़रों से देख रही थी।

“ये तो सब करते हैं और तुम जानती हो कि मैं सबकी तरह नहीं हूँ,” उसकी आँखों में मेरी इस बात पर एक मौन सहमति थी।

"मेरी चिंता मत करो, प्रिया। अब जाओ नहा-धो लो। मैं अभी थोड़ी देर सोऊँगी।”

प्रिया के जाने के बाद मैं एक बार फिर अकेली थी। शाम को शादी थी, मुझे आराम करना था ताकि अपनी बरबादी के जश्न के हर इक पल का लुत्फ़ उठा सकूँ। रात भर छत पर सोते रहने के कारण मेरा शरीर अब भी ठिठुर रहा था। रज़ाई में घुसकर आँखें मूँदकर लेट गई। दिमाग में शाम को होने वाली घटनाओं को लेकर डर अपना सिर उठा रहा था।

No comments:

Post a Comment